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कृष्ण जन्माष्टमी-कान्हा का जन्मोत्सव और भक्तो का उल्लास

Sweet Krishna

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पाँच हजार साल पहले एक दिव्य बालक के जन्म ने पूरी धरती को पवित्र कर दिया। मथुरा को अपने जन्म से धन्य किया और कंस मामा का वध करके सच्चाइ की ताकत को बढावा दिया। गोकुल मे पालन पोषण हुआ। गोकुल मे कान्हा का रास, माखन की चोरी और यशोदा मइया का प्यार बहुत हि मनोरम नजारा हुआ करता था। कहते है गोपियो के रुप मे अनेक सिद्ध ऋषियो ने प्रभु के भक्ति रस का पान किया। फिर महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध मे अपनी लीला से पूरे विश्व को सच्चाइ की ताकत से रुबरु करवाया।

श्री कृष्ण ने ना जाने कितनी और लीला रची, जिनका महत्व आज भी जीवित है। गीता के उपदेशों को आज भी जन-जन के व्यवहार मे देखा जा सकता है।

कान्हा का जिक्र राधा के नाम के बिना अधूरा है। इन दोनो का प्रेम एक आदर्श है। इस प्रेम मे राधा की पवित्रता और महानता का इसी से पता लगाया जा सकता है कि पूरी दुनिया इस प्रेमी जोडे को राधे-कृष्ण के नाम से पुकारती है। कोइ कृष्ण-राधे नही कहता पूरा संसार राधे-कृष्ण का हि मंत्र जपता है। बरसाने की राधा से गोकुल के कान्हा का प्रेम अदभुत और आलौकिक है।कान्हा के लिए मीरा की भक्ति और अपार प्रेम भी संसार ने देखा। मीरा ने अपनी सच्ची भक्ति से कान्हा के समीप पँहुचने की कोशिश की।

कृष्ण का जन्म संसार के लिए बहुत ही सुंदरतम पल था। हर साल इस पल की वर्षगाँठ का लाखों-करोडों भक्तो को इंतजार रहता है। हमारे ग्रंथो ने इस ऐतिहासिक कृष्ण जन्म दिवस को कृष्ण जन्माष्टमी की संज्ञा दी है।

मथुरा के कारागार मे जन्मे कान्हा के जन्म महोत्सव को पूरे भारत समेत विश्व के अन्य सभी हिस्सो मे धुमधाम से मनाया जाता है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम पूरा हिन्दुस्तान इस दिन कृष्ण की भक्ति मे डुब जाता है। देश मे जगह-जगह मन्दिरो की साज-सज्जा की जाती है। जगमगाती रोशनी मे नहाये मन्दिरो मे बडी संख्या मे लोग पहुंचते है।

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान कृष्ण और राधारानी की झाँकी को देखने मे अजब आनन्द की प्राप्ति होती है। छोटे-छोटे बच्चो से लेकर बडे-बडे कलाकार इन झाँकियों मे हिस्सा लेते है। कृष्ण की वेशभूषा पहने बच्चो मे बाल-गोपाल की साक्षात अनुभुती होती है।

भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा का माहौल कृष्ण जन्म दिवस पर पूरी तरह कृष्णमय होता है। देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सो से इस दिन मथुरा बाल गोपाल के दर्शन के लिए पहुंचने वाले भक्तो का उत्साह शब्दो मे व्यक्त नही किया जा सकता। यह लाखो भक्त इस दिन भगवान के दर्शन से परम सुख से लाभान्वित होते है। जन्मभुमि के अलावा बरसाना, गोकुल, वृन्दावन और गोबरधन के मन्दिरो मे भी भक्त बडी संख्या मे पँहुचते है। मथुरा की जन्माष्टमी बहुत ही अहम और खासकर पर्यटको के लिए यादगार होती है।

भगवान कृष्ण की कर्मभूमि द्वारिका मे भी द्वारिकाधीश के जन्म का महोत्सव जोर-शोर से मनाया जाता है। जगन्नाथपुरी मे भी कृष्ण रस मे डुबे भक्त प्रभु के जन्म के आलौकिक क्षणो का बेसब्री से इन्तजार करते है। देश के अलग-अलग हिस्सो मे स्थित इस्कॉन मन्दिर भी कान्हा के जन्म का विशेष आयोजन करते है।

कान्हा गोकुल के ग्वालो के संग माखन चोरी किया करते थे। भगवान की लीला को आगे बढाते हुए देशभर मे मटकी-फोड़ प्रतियोगिता का आयोजन होता है। पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही-हांडी को फोडा जाता है। इस आयोजन मे उमड-भीड़ का उत्साह देखते ही बनता है। ‘गोविन्दा आला रे’ की गुंज से पुरे माहौल मे जोश दौड जाता है। दही-हांडी के इस उत्सव मे लाखो रुपये इनाम भी होता है।

कान्हा के जन्म का उत्साह और कान्हा के प्रति भक्ति जन्माष्टमी को विशेष बना देते है। इस दिन रात बारह बजे जब कृष्ण धरती पर पधारते है तो उनके पालने को झुलाने पर अदभुत आनन्द प्राप्त होता है।

सचमुच इस दिन का अपना ही महत्व है।
जय श्री राधे कृष्ण।

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