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कब तक सहेगी नारी – लाचार महिला बनाम पुरूष प्रधान समाज

लाचार महिला vs पुरूष प्रधान समाज

लाचार महिला vs पुरूष प्रधान समाज

महिलाएँ समाज का अहम हिस्सा है। एक माँ से लेकर बहन, बेटी और पत्नी जैसे किरदारो को जीवित करता है एक महिला। नौ महिने संतान को कोख मे पालती भी है ये महिला। यह रक्षाबंधन के धागो को राखी का नाम दिलवाती है तो जीवन भर के लिए अपना घर छोडकर एक मर्द के घर की शोभा भी बनती है। फिर भी वो क्या कारण है कि लाचार है यही महिला।

लाचारी उपेक्षा की जो उसे एक महिला होने की वजह से झेलनी पडती है। गुलामी की जो उसके सपनो और इच्छाओ को दबा देते है। अत्याचारो की जो उसे समाज के हर मोड पर देखने को मिलते है। उन प्रथाओ की जो उसकी रफ्तार और उडान को रोकने के लिए ही बनायी गयी है।
समाज और इसके महिला विरोधी कायदे-कानुन ही महिलाओ की बेबसी के लिए उत्तरदायी है। इन्ही कायदे-कानुन ने कट्टर और रूढिवादी विचारो के रूप मे महिलाओ के खिलाफ माहौल तैयार किया है।

जन्म से ही नारी का संघर्ष शुरू हो जाता है। समाज ने वंश बढाने के लिए जो माप-दंड तय किए है उनकी माँग है कि लडका होना जरूरी है। बस वारिस होने की यह योग्यता ही महिलाओ की जिन्दगी मे सेंध लगाने के लिए काफी है। बेटी इस अधिकार के काबिल सिर्फ इसलिए नही है क्योकि समाज के नियमो के अनुसार वो पराया धन है जो शादी के बाद पति के घर की हो जाएगी। पति का नाम और संपत्ति ही उसका होगा। पर अगर बेटा होगा तो वंश का विस्तार होगा और जिन्दगी भर वो माँ-बाप के साथ सहारे के रूप मे भी रहेगा। समाज का यह नियम रूढिवादी सोच मे बदल चुका है। ऊपर से दहेज प्रथा ने समाज के महिला विरोधी माहौल को खुब हवा दी है। बेटी को दहेज देना पडेगा और बेटे को दहेज मिलेगा ये सब सोच आम आदमी के दिलोदिमाग पर छाए रहते है। वारिस और दहेज का लालच इन दंपत्तियो को कन्या-भ्रृण हत्या के अपराध की ओर ढकेल देता है। और जो बच्ची पैदा हो भी जाती है उसे जीवनभर उपेक्षा का शिकार होना पडता है।

वारिस और दहेज प्रथा के अलावा सती प्रथा, बाल-विवाह, विधवा प्रथा सरीखी प्रथाएँ महिलाओ को दबाती रही है। इन सभी के पीछे पुरूष प्रधान समाज है जहाँ आदिकाल से नियमो की रचना कुछ पुरूषो ने ही की है। साथ ही इन नियमो को जबरदस्ती महिलाओ पर थोप दिया गया है। सती प्रथा को ही देख लीजिए, एक औरत को उसके पति के साथ चिता मे जलाने की प्रथा, महिलाओ पर अत्याचार नही तो क्या है। और अगर समाज के लिए ये जरूरी ही था तो सिर्फ पत्नी ही क्यो पति भी तो अपनी अर्धांगनी की चिता मे कुदकर अपने रिश्ते की पवित्रता का प्रमाण दे सकता है।
बाल-विवाह भी महिलाओ पर अत्याचार से कम नही है। कम उम्र मे ही परिवार से अलग हो जाने के चलते पढाई तो छुट ही जाती है साथ ही बचपन की सारी खुशियाँ ससुराल के अजनबी माहौल मे गुम हो जाती हैं। फिर अगर पति का देहांत हो गया तो कच्ची उम्र मे ही विधवापन की निराशा का भी सामना करना पडता है। जो जिन्दगी सही से रंगो मे घुल भी ना पाई थी, उसे रंगो से सदा के लिए दुर बनानी पडती है। पति की असमय मृत्यु का दोष भी समाज महिलाओं पर ही मढ देता है। विधवा जीवन का विचार आते ही रूह कांप उठती है। पति से पहले और उसकी मृत्यु होने के बाद एक विधवा के जीवन मे बड़ा ही विचित्र बदलाव आता है। यह प्रथा भी सिर्फ स्त्रियो पर ही लागु होती है पुरूषो के रहन-सहन पर पत्नी की मृत्यु का कोई खास असर नही पडता है। उन्हे तो उलटा दुसरे विवाह की पुरी आजादी दी जाती है। समाज ने ना जाने और कितने बन्धन महिलाओ के लिए तैयार किए हुए है।

सामाजिक प्रथाओ और कायदे-कानुनो ने लोगो की सोच को ही कलंकित कर दिया है। यही कारण है कि महिलाओ पर अत्याचार की घटनाएँ आये दिन सुनने को मिलती है। गृह-कलेश हो या फिर दहेज के लालच मे पत्नी की हत्या, शहरी शिक्षित और नैतिक मुल्यो से परिपूर्ण लोगो को छोड दिया जाये तो पुरूष महिला के प्रति बर्बर ही रहा है। समाज के नियम कही न कही महिला को कमजोर और डरपोक बना देती है यही कारण है कि बालात्कार जैसी घटना के आंकडे बढते ही जा रहे है। सड़क से लेकर घर की चौखट तक महिला सुरक्षित नही है। कुछ बुद्दीमानो का मानना है कि लडकियो का छोटे कपडे और जीन्स का पहनावा बालात्कार की घटना को बढावा देते है। शायद उन्हे पता नही साडी और सूट पहनने वाली महिलाओ के साथ भी बालात्कार की घटनाएँ होती है। राहगीर से लेकर आस-पडोसी, रिश्तेदार और यहाँ तक की पिता, ससुर, भाइ और जेठ से भी महिला को खतरा है। महिला लाचार है क्योकि वो कमजोर है।

पुरूष के जीवन मे शादी के पहले और बाद मे कोइ खास परिवर्तन नही आता। लेकिन महिला का जीवन शादी के बाद पूरी तरह बदल जाता है। सूट-सलवार और जीन्स छोडकर साडी तक सीमित हो जाना हो या फिर मायके से जोडे लोगो से दुरियाँ, महिला को अपने आप को समाज और ससुराल के हिसाब से ढालना ही पडता है। पति से नीची आवाज और आप करके बात करना तो वो मायके से ही सिख कर आती है। फिर चाहे पति कितना ही तू-तडाक या सीधा गाली देकर बात करे। जब अगली पीढी आती है तो पहले एक माँ के रूप मे अपनी बेटी को अपने रंग मे ढालती है फिर साँस के रूप मे बहू को अपने सारे गुण सिखाती है। इस तरह पुरूष प्रधान समाज का जाल एक महिला से दुसरी महिला को फँसाता चला जाता है।

 लाचार महिला vs पुरूष प्रधान समाज

लाचार महिला vs पुरूष प्रधान समाज

समाज मे जड जमाये बैठी महिला-विरोधी विचारधारा को कैसे बदला जा सकता है? इसका सीधा जवाब है कि जब तक समाज मे हर व्यक्ति नैतिक मुल्यो को अपने व्यवहार मे नही उतारेगा महिलाओ की स्थति मे सुधार संभव नही है। नैतिक मुल्यो शिक्षा से आते है जिसके लिए अच्छी शिक्षा जरूरी है। साथ ही अगर हर व्यक्ति महिलाओ के प्रति अपनी सोच मे परिवर्तन लाये तो महिलाओ की दशा जरूर सुधरेगी। महिला भी इन्सान है और हर इन्सान के मानवाधिकारो की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। महिलाओ को सिर्फ भोग-वासना का जरिया या फिर नौकरानी समझने की जगह अगर हम उन्हे अपनी बहन या दोस्त समझे तो जरूर महिला सुरक्षित महसूस करेगी।

महिलाएँ आज काफी आगे निकल आयी है। उच्च पदो से लेकर राजनीति मे भी इन्होने अपना दबदबा कायम किया है। बडी संख्या मे महिलाएँ नौकरियाँ कर रही है। यह सब महिलाओ के प्रति सौहार्दपूर्ण सोच के विकास के कारण संभव हो पाया है। महिलाएँ उनकी रक्षा के लिए बनाये गये कानुनो को समझने लगी है। ज्यादातर जागरूक महिलायें अन्याय को बर्दास्त नही करती। पति के साथ रिश्ते मे तनाव की स्थिति मे तलाक देने से वो कदापि नही हिंचकती। अपने अपराधियो को सजा दिलाने के लिए ये महिलाएँ पूरे साहस और निडरता के साथ लडती है। परन्तु यह जागरूकता बडे शहरो तक ही सीमित है। गाँवो और छोटे शहरो के अनैतिक और अशिक्षित वर्ग मे स्थिति जस के तस है। महिलाओ मे जागरूकता हर जगह पहुँचने के बाद ही सही बदलाव आ पायेगा।

परिवर्तन के लिए बदलने की सोच और बदलाव की शुरूआत करना जरूरी है। तो पहले खुद बदले फिर समाज को बदले ताकि हमारी माँ, बहन, दोस्त और पत्नी निडर होके चल सकें।

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