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बीजेपी मे अब गूंजेगा बस नमो नमो का जाप

भाजपा के पीएम मोदी

भाजपा के पीएम मोदी

नरेन्द्र मोदी को आखिरकार भाजपा संसदीय बोर्ड ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर ही दिया। शुक्रवार को मोदी समर्थक भाजपा खेमा खुशी से झूम उठा। पूरा माहौल मोदीनूमा हो गया। शुक्रवार,13 सितंबर,2013 का दिन गुजरात के मुख्यमंत्री के लिए यादगार साबित हुआ। देशभर के तमाम कार्यकर्ता जो मोदी को पहले ही बॉस मान चुके है, उनकी खुशी का कोई ठिकाना रहा। देश भर मे मोदी की पीएम उम्मीदवारी का जश्न कार्यकर्ताओ के साथ-साथ मोदी के करोडो फैन्स ने भी पटाखे फोडकर और मीठाइ बाँटकर बनाया।

वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के तमाम मोदी के विरोध के बावजूद वही हुआ जो संघ और मोदी के कट्टर समर्थक राजनाथ सिंह चाहते थे। जगजाहिर है संघ की शाखा के रूप मे काम करने वाली भाजपा संघ के फैसले को टाल ही नही सकती। फिर चाहे कितने ही बडे तोपची फैसले का विरोध कर ले। आडवाणी भी अपने फैसले पर अडे रहे और संसदीय बोर्ड की बैठक मे ना जाकर उन्होने अपना साफ-साफ विरोध भी जता दिया। इससे पहले भी आडवाणी ने मोदी को भाजपा चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने पर पार्टी के सभी पदो से इस्तीफे की पेशकस की थी। इस प्रकरण के बाद आडवाणी बनाम मोदी की तकरार खुलकर सामने आ गयी थी।

सही मायनो मे आडवाणी अपने हठ के कारण पार्टी को नुकसान पहुँचा रहे है। भाजपा आडवाणी और मोदी गुट मे बँटती नजर आ रही है। जो की जनता प्रत्यक्ष तौर पर देख भी रही है। आडवाणी या तो अपनी वरिष्ठता को लेकर चिन्तित है या फिर उनकी अनदेखी उन्हे रास ही नही आ रही। पर कोई आडवाणी जी को बताये की पतंग भी हवा के मुताबिक रूख बदल देती है अकेले पार्टी का विरोध करने से आप पत्ता तक भी ना हिला पायेंगे। आडवाणी जी ही बीजेपी को अर्श से फर्श तक लाये और अब उन्हे उनकी पार्टी ही अनदेखा कर रही है। साफ है हवा मोदी के साथ है। तो आडवाणी जी को भी परिस्थतियों के साथ तालमेल बनाना ही होगा तभी शायद वो अपनी बात को सही ढंग से रख सकेंगे।

आडवाणी के अलावा सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी सरिखे नेता भी पहले मोदी की उम्मीदवारी का विरोध जरूर कर रहे थे। पर पार्टी और संघ के मनाने के बाद इन्होने अपने हथियार डाल दिये। मोदी की ताजपोशी के समय भी ये दोनो नेता कुछ उखडे-उखडे लग रहे थे। जबरदस्ती ही सही पर इन्होने पार्टी की लाज रख ही ली। आडवाणी भी इन नेताओ के समर्थन से उत्साहित थे लेकिन अंतिम क्षणो मे जो बाजी पलटी उससे आडवाणी जी को जोरदार झटका जरूर लगा होगा।

संसदीय बोर्ड के बाकी सदस्य नितिन गडकरी, अरूण जेटली, रामलाल, थावर चन्द गहलोत, वैंकया नायडू और खुद राजनाथ पहले ही फैसले पर हामी भर चुके थे। राजनाथ, अरूण जेटली मोदी के समर्थको मे शुमार है तो नितिन गडकरी, वैंकया नायडू, रामलाल और थावर चन्द गहलोत संघ का फैसला होने के कारण मोदी की उम्मीदवारी के साथ खड़े दिखायी दिए। जो भी हो आडवाणी को छोडकर सभी नेताओ ने मोदी की उम्मीदवारी पर अपनी मुहर लगा ही दी।

मोदी की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद पार्टी के सामने कई चुनौतियाँ पहाड़ है। मोदी को सारी चुनौतियो को बडी सूज-बूझ से अपने रास्ते से हटाना होगा। पार्टी अभी सिर्फ चार राज्यो मे काबिज है। गुजरात, छत्तीसगढ़ ,मध्य प्रदेश और गोवा के आलावा बाकी राज्यो मे या तो भाजपा सरकार से बेदखल हो चुकी है या फिर वहाँ उसका सूपडा ही साफ हो गया है। चार राज्यो मे से भी दो मे आने वाले दिनो मे चुनाव होने है, बीजेपी अगर यहाँ हारी तो उसकी मुश्किले और बढ़ जायेंगी। पर राजस्थान और दिल्ली मे अगर वापसी होगी तो बीजेपी के लिए इससे अच्छा कुछ हो ही नही सकता। लेकिन जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिसा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और केरल कुछ अहम राज्य है जहाँ पार्टी सूपडा साफ होने के बाद उसे फिर से मजबूत स्थिति मे लाने की बडी जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी के कन्धो पर होगी। साथ ही महाराष्ट्र ,कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, झारखंड और बिहार, जहाँ पार्टी मजबूत विपक्ष की भूमिका मे है वहाँ भी पार्टी को लोगो का भरोसा जितना ही पडेगा। भाजपा का अहम लक्ष्य उत्तर प्रदेश के मतदाताओ को लुभाना होगा क्योकि यूपी होकर ही दिल्ली की सत्ता की चौखट तक पहुँचा जा सकता है।

भाजपा और मोदी के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण मुद्दा मुस्लीम वोट होगा। भारतीय जनता पार्टी हमेशा से ही भगवा राजनीति करती रही है। राम मन्दिर की वकालत बीते सभी चुनावो मे बीजेपी के लिए घाटे का सौदा ही रही है। शायद इसी लिए पार्टी को 2004 और 2009 के चुनावो मे हार का सामना भी करना पडा। गुजरात 2002 दंगो ने मोदी को सांप्रदायिक रंग मे रंग दिया। मोदी अब भाजपा के पीएम उम्मीदवार घोषित भी हो गये है। तो मुसलमान कितना मोदी को स्वीकार करते है ये निर्भर करेगा मोदी किस तरह अपने आप को सांप्रदायिक छवि से निकाल पाते है। गुजरात मे मुसलमान समर्थन से उत्साहीत मोदी मे ये कारनामा करने की काबलियत भी है।

भाजपा ने जैसे ही अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के नाम की घोषणा की, उसी पल राहुल गाँधी को काँग्रेस की ओर से पीएम उम्मीदवार घोषित करने की माँगो का बाजार गर्म होने लगा। पर काँग्रेस ने भी 2014 चुनावो को मोदी बनाम राहुल बनने से रोकने के लिए उम्मीदवार घोषित करने से मना कर दिया। मनमोहन समेत पार्टी के कई नेता पहले भी राहुल को पीएम बनाने की वकालत करते रहे है। पर साफ है राहुल कभी पार्टी संगठन से बाहर निकले ही नही। ऐसे मे मोदी के राजनीतिक करियर के सामने राहुल कही भी नही टिकते है। कांग्रेस इस बात का फायदा भाजपा को कतइ नही पहुँचाना चाहेगी। कांगेस ने साफ कर दिया है कि पार्टी चुनावो से पहले अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नही करेगी।

लडाई चाहे मोदी बनाम राहुल हो या फिर मोदी बनाम आडवाणी या गुजरात बनाम बाकी राज्य, मोदी के नाम का बिगुल बज चुका है और मोदी ने भी अपनी कमर कस ली है। 2014 चुनाव किसके हक मे जायेंगे ये सब आने वाला वक्त ही बता पायेगा। हमे तो सिर्फ तमासा देखना है।

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