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अगले पाँच साल किसकी दिल्ली-2013 विधानसभा चुनाव दंगल

कान्ग्रेस बनाम आप बनाम भाजपा

कान्ग्रेस बनाम आप बनाम भाजपा

भारत के कई सुल्तानो की राजधानी दिल्ली को नवम्बर मे फिर से अपना नया शासक चुनने का मौका मिलने वाला है। जब दिल्ली मे 1952 मे पहली बार विधानसभा चुनाव हुए तो देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक दल कांग्रेस को चौधरी ब्रह्म प्रकाश के नेतृत्व मे दिल्ली को पहली सरकार बनाने का गौरव प्राप्त हुआ। तब से आज तक कई मुख्यमंत्री गए और आए पर सत्ता कांग्रेस और बीजेपी के इर्द गिर्द ही घुमती रही है।

दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस के काबिज होने के बाद दो मुख्यमंत्री राजधानी ने देखें। 1955 मे जी.एन.सिंह दिल्ली के दुसरे मुख्यमंत्री बने। अगले विधानसभा चुनाव हो पाते इससे पहले ही दिल्ली से राज्य के दर्जा वापस ले लिया गया। 1956 से 1993 तक दिल्ली केंद्र शासित राज्य बनी रही। 1993 मे दोबारा से राज्य बनकर दिल्ली वजूद मे आयी। 1993 मे दिल्ली मे दुसरा विधानसभा चुनाव हुआ। इस बार गेंद भाजपा के पाले मे जाके गिरी। भाजपा के मदन लाल खुराना दिल्ली के तीसरे मुख्यमंत्री बने। भाजपा के पाँच साल के कार्यकाल मे तीन मुख्यमंत्री बदले। लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज भी 1998 मे दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी। 1998 के तीसरे विधानसभा चुनाव कांग्रेस के नाम रहे। शीला दीक्षित दिल्ली की छठी मुख्यमंत्री बनकर सुर्खियों मे आयी। शीला ने कांग्रेस के किले को लगातार दो बार बचाते हुए 2003 और 2007 विधानसभा चुनावो मे भी कामयाबी हासिल की। इस तरह वो दिल्ली की पहली मुख्यमंत्री बनी जो लगातार 15 साल तक अपने पद टिकी रही है।

दिल्ली मे भाजपा और कांग्रेस के बीच दोतरफा खेल को बिगाडने का प्रयास कइ दलो ने किया। बसपा, एनसीपी और राजद सरीखे दुसरे राज्यो के क्षेत्रीय दल दिल्ली के मैदान मे हुंकार भर के तो उतरे, लेकिन जनता ने कभी भी इक्का-दुक्का सीट से आगे इन दलो को बढ़ने ही नही दिया। पर इस बार भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल की मुहीम से सुर्खियो मे आये अरविन्द केजरीवाल ने अपने राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी को भी दिल्ली के सियासी मैदान मे उतार दिया है। आप के दिल्ली विधानसभा चुनाव मे आने से कांग्रेस-बीजेपी के वोटो को हानि पहुँचना तो लगभग तय है। केजरीवाल खुद दिल्ली से ताल्लूक रखते है इसके चलते आप क्षेत्रीय दल के तौर कमाल कर सकती है। लेकिन क्योकि आप ने हाल मे ही सियासत मे अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है, इस वजह से गैर-कांग्रेस और गैर-बीजपी सरकार बनने के कोई भी आसार फिलहाल तो नजर नही आ रहे। कभी बिजली तो कभी आटो रिक्शा वालो के लिए संघर्ष करते हुए आप ने लोकप्रियता हासिल करने की भी भरपूर कोशिश की। जो आने वाले चुनाव मे पार्टी के लिए काफी मददगार भी साबित होगा। इतना जरूर तय है कि आम आदमी पार्टी इस बार दिल्ली में महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाने वाली है। वैसे भी जनता के रूख का क्या पता कब किस ओर हो जाये। जनता अगर चाहेगी तो अरविन्द केजरीवाल भी सरकार बना ही लेंगे। वैसे भी कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी का दामन भी भ्रष्टाचार से बचा नही हैं। कांग्रेस और बीजेपी के विकल्प के तौर पर आप भी पूरे दम-खम के साथ मैदान मे कूदने को बेताब है।

दिल्ली का विकास कांग्रेस का अहम चुनावी मुद्दा है। चारो तरफ फैली मैट्रो, चौडी सडके और बिजली की जबरदस्त आपूर्ति शीला सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ है। लोग भी कांग्रेस के विकास कार्यो से संतुष्ट है। लेकिन देखा जाए तो दिल्ली के विकास का श्रेय शीला दीक्षित को देना बेईमानी होगा। क्योकि दिल्ली का अधिकतर विकास कार्य कामनवेल्थ गेम्स की साज-सज्जा और तैयारियो के कारण हुआ। दिल्ली की कायापलट करने के लिए केन्द्र से 70 हजार करोड़ का फंड अलग से राज्य सरकार को दिया गया। अगर इतना फंड कही और भी लगाया जाता तो वहाँ भी दिल्ली जैसा विकास जरूर देखने को मिलता। मगर शीला सरकार इस बात को लेकर अपनी पीठ थपथपाते फूले नही समाती।

दिल्ली मे आज कई इलाके ऐसे भी है जहाँ विकास नही पहुँच पाया है। पुरानी दिल्ली, सीमापुरी, इन्द्रलोक और बदरपूर जैसे ना जाने कितने इलाके विकास का इन्तजार कर रहे है। दिल्ली मे गरीबी और गन्दी यमुना अहम चुनावी मुद्दा बन सकते है। यमुना के तीन एक्शन प्लान आ चुके है लेकिन दिल्ली को पवित्र करने वाली यह नदी अभी तक साफ नही हो पायी। क्योकी दिल्ली की वजह से ही यह सबसे अधिक गन्दी होती है, इसलिए गन्दी यमुना कांग्रेस के गले की फांस बन सकती है। इन सब मुद्दो से बड़ी और अहम समस्या है महंगाई। दिल्ली समेत पूरा देश महंगाइ की जबरदस्त मार से जूझ रहा है। क्योकि केन्द्र मे बैठी कांग्रेस की ही सरकार महंगाइ के लिए जिम्मेदार है। तो इसका सीधा असर कांग्रेस की दिल्ली सरकार पर भी पडना तय है। प्याज के बढे दामों ने ही 1998 मे सुषमा को सत्ता से बेदखल करके शीला को सत्ती की कमान सौंपी थी। एक बार फिर प्याज के दाम आसमान पर है और दिल्ली के चुनाव भी सर पर है। शीला किस तरह बाकि मुद्दो को बुना पाती है यह देखना दिलचस्प होगा। महंगाई कांग्रेस के लिए दिल्ली के साथ-साथ लोकसभा चुनाव मे भी दमदार चुनौती पेश करेगी। इधर भाजपा और आप दोनो ही इन सभी मुद्दो को कांग्रेस के विरूद्ध बुनाने की भरपूर कोशिश जरूर करेंगे। इतना तय है कि बिजली, पानी और महंगाई इन विधान सभा चुनावों मे परेशानी का सबब बनने वाले है।

भाजपा नरेन्द्र मोदी के पीएम उम्मीदवार घोषित होने के बाद पूरे उत्साह मे है। फिलहाल लग रहा है आप के आने के बाद भाजपा की सरकार बनाने की मंशा खटाई मे पड सकती है। लेकिन इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि अगर गठबंधन होने की स्थिति मे आप बीजेपी के साथ ही जायेगी। क्योकि कांग्रेस से तो वैसे ही केजरीवाल का छत्तीस का आंकडा है और केजरीवाल सरकार के अन्दर होकर अपनी बातो को भी मनवा पायेंगे। फिलहाल तो भाजपा इन सारी संभावनाओ से दूर अकेले सरकार बनाने का दावा ठोक रही है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि भाजपा के पास दिल्ली के मुख्यमंत्री बनले लायक दिल्ली के लिए कोइ मजबूत नेता ही नही है। अंतर्कलह भी भाजपा की राह मे रोडा बन सकती है। बीजेपी को अगर पन्द्रह साल बाद सत्ता मे वापसी करनी है तो इन समस्याओं से निजात पाने के साथ-साथ कांग्रेस के खिलाफ मजबूत रणनीति के साथ आगे बढना होगा।

दिल्ली समेत पाँच राज्यो मे नवम्बर मे चुनाव होने है। अगले ही साल लोकसभा चुनाव भी है इसलिए नवम्बर मे होने वाले चुनावो को केन्द्र की सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर भी देखा जा रहा है। इसीलिए यह चुनाव और अहम हो जाते है। जहाँ-जहाँ चुनाव होने है लगभग सभी जगह सीधी लडाई कांग्रेस-बीजेपी के बीच ही है। दोनो ने ही अपनी कमर भी कस ली है। भ्रष्टाचार की लडाई लड रहे केजरीवाल के लिए भी दिल्ली के चुनाव लिटमस टेस्ट के तौर पर देखा जा रहा है। अन्ना से अलग होकर राजनीतिक मंच से कितनी सफलता केजरीवाल बटोर पाते है यह तो आने वाले चुनाव परिणाम ही बता पायेंगे।

वैसे दिल्ली की राजनीति जो बयां करती है उसके शीला का आना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। भाजपा सरकार बनाने की मजबूत स्थति मे है। आम आदमी पार्टी भी गेम चेन्जर बन सकती है। साथ ही गठबंधन की संभावनाओ से भी इन्कार नही किया जा सकता। परन्तु कोइ भी राय बनाकर जीत हार तय करना मुश्किल है, भारत मे मतदाता कहाँ चले जाये कुछ नही कहा जा सकता। कई बार तो सर्वे भी मतदाताओ की सही राय का आकलन नही कर पाते है।

खेल की बिसात बिछने लगी है कांग्रेस खाद्य सुरक्षा बिल लागू करने के साथ-साथ आचार संहिता लागू होने से पहले तमाम योजनाओ का लोकार्पण करके लोगो को लूभा रही है। वही बीजेपी भी एमसीडी में काबिज होने का फायदा उठाते हुए योजनाओ को चारजामा पहना रही है। आम आदमी पार्टी भी अपने कदम फूट-फूट के रख रही है। दिल्ली मे स्थानीय लोगो से ज्यादा बाहर से आये लोगो की आबादी रहती है। इतनी सम्पन्न और जुदा जनता को कैसे अपनी ओर आकर्षित किया जाये यही तमाम दलो की कोशश रहेगी। अब जो भी होगा वो तो नवम्बर मे ही पता चलेगा। हमे तो बस इतना देखना है कि कांग्रेस, बीजेपी और आप के त्रिकोणीय खेल मे कौन बाजी मारता है।

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