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राजभाषा हिन्दी की बदहाली-ना घर की ना घाट की

हिन्दी बनाम अंग्रेजी भारतीय संस्कृति बनाम पाश्चात्य संस्कृति

हिन्दी बनाम अंग्रेजी
भारतीय संस्कृति बनाम पाश्चात्य संस्कृति

भारत का इतिहास बहुत पुराना है। और इतिहास का ज्ञान ग्रंथो से होता है, साहित्य से होता है। आर्यो से शुरू हुइ भारतीय भाषाओं की कहानी बडी ही दिलचस्प है। सन् 2000 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक का काल संस्कृत का था, हमारे तमाम पुराण, उपनिषद और पौराणिक ग्रंथ इसी काल मे संस्कृत भाषा मे लिखे गये। फिर अपभ्रंश से पालि और प्राकृत से होते हुए सन् 1000 ई. के आसपास हमारी भाषाएँ आधुनिक काल के मुहाने पर पहुँची। यहाँ पर आम बोलचाल से प्रभावित होते हुए संस्कृत नये रूप मे आ चुकी थी। संस्कृत के इस बिग़डे लेकिन प्रासंगिक रूप को हिन्दी का नाम दिया गया।

हिन्दी के साथ-साथ संस्कृत से कई आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओ का उदभव हुआ। बंगाली, मराठी, पंजाबी और दक्खिनी जैसी भाषाओ का जन्म इसी दौरान हुआ था। लेकिन हिन्दी को छोडकर संस्कृत से उपजी बाकी भाषाएँ सीमित क्षेत्र मे ही बंधी रह गयी। शुद्ध हिन्दी को कभी भी आम बोलचाल की भाषा मे उपयुक्त नही किया गया, हिन्दी का शुद्ध रूप केवल साहित्यिक तौर पर उपयोग किया जाता था। आम बोलचाल की भाषा के रूप मे हिन्दी की अनेक बोलियाँ विकसित हुई। ब्रज, अवधी, राजस्थानी, खडी बोली और भोजपुरी जैसी कई बोलियाँ इस बीच उभर कर आयी।

भारत की दौलत और सम्पन्नता के कारण इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था। सोने की चिड़िया का शिकार करते करते कई विदेशी भारत की दहलीज तक पहुँचे। भारत आने वाले हर घुसपैठिये के कारण नई संस्कृतियो का देश मे आगमन हुआ। नई संस्कृतियो और उनकी भाषाओं ने हिन्दी को भी प्रभावित किया। लेकिन इससे हिन्दी का वजूद पर कोई भी असर नही पडा। लेकिन अंग्रेजो के आगमन के साथ अंग्रेजी भी भारत आयी। सात समंदर पार से आयी इस भाषा ने भारत की सबसे लोकप्रिय भाषा हिन्दी की जडो को हिला कर रख दिया। शैक्षिक, व्यवसायिक और कार्यालय के स्तर पर अंग्रेजी की पकड बढती गयी और हिन्दी के कद को लगातार छोटा करती गयी। वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी को मिलते महत्व ने इस विदेशी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा बना दिया। इससे हिन्दी समेत भारत की अन्य भाषाओं का प्रयोगात्मक रूप लगभग खत्म सा हो चला था।

आजादी तक आते-आते प्रशासनिक स्तर से लेकर व्यवसाय और शैक्षिक स्तर पर अंग्रेजी पूरी तरह से छा चुकी थी। ऊपर से गैर हिन्दी राज्यो के विरोध के कारण हिन्दी को राष्ट्रभाषा तो बनाया जा ही ना सका साथ-साथ राजभाषा के रूप मे भी हिन्दी की स्वीकार्यता को बढावा देने के लिए 15 साल का समय सरकार को दिया गया। इस बीच अंग्रजी को 15 साल के लिए हिन्दी के साथ सहचरी भाषा नियुक्त किया गया। लेकिन पन्द्रह साल बाद भी हिन्दी की स्थिति जस के तस रही और इस बीच सरकार ने गैर हिन्दी राज्यो के दबाव मे संविधान मे संशोधन करते हुए अंग्रजी को अनिश्चित काल के लिए हिन्दी के साथ राजभाषा बनाये रखा। जो बीज अंग्रेजो ने भारत की संस्कृति को हानि पहुँचाने के लिए बोया था उसने पेड बनकर हिन्दी की जडो को झकझोरना भी शुरू कर दिया था।

हिन्दी की स्वीकार्यता पर सवाल खडे किए साहित्यिक हिन्दी और उसके निर्माताओ ने। हिन्दी को इतना जटिल बना दिया कि हिन्दी भाषियो मे ही ऐसे हिन्दी को लेकर भय पैदा होने लगा। फिर सारी तकनीक और प्रोद्योगिकी का भी विदेशो से देश मे आयी। इसी कारण शिक्षा मे भी अंग्रेजी को बढावा मिला। हिन्दी का कद और कम होता गया। ऊपर से संगणक के उपयोग ने हिन्दी के अस्तित्व को हिला दिया। क्योकि कंम्प्युटर पर सारा काम अंग्रेजी मे ही होता है इस वजह से सभी जगह नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया। इस तरह आधुनिकता के तूफान मे हिन्दी तो कही गुम सी हो गई।

पाश्चात्य संस्कृति की स्वीकार्यता ने हिन्दी को आम बोलचाल की भाषा के तौर पर भी कड़ी चुनौती पेश की है। महानगरो मे तो अंग्रेजी का नशा है हि लेकिन बाकी बड़े शहर भी भारत की संस्कृति को भुलते हुए पाश्चात्य संस्कृति की ओर खिचे चले जा रहे है। छोटे शहर मे अभी तक पश्चिम की संस्कृति पैर नही जमा पायी है। लेकिन हिन्दी और भारतीय संस्कृति की उपेक्षा अगर यू ही जारी रही तो हर शहर और गाँव मे इसका चलन और हिन्दी का विलुप्त होना दुर नही है।

आधुनिकता को बढावा देने के लिए अंग्रेजी भाषा को महत्व तो हम देते है। लेकिन हम ये क्यो भुल जाते है कि हमारे पडोसी चीन मे आधुनिकता हमसे कई गुना ज्यादा है परन्तु प्रशासन, व्यवसाय और शैक्षिक हर स्तर पर आज भी वहाँ मंडारीयन ही प्रयुक्त होती है। इसके अलावा रूस, फ्रांस, जर्मनी ना जाने कितने देश है जहाँ आज भी मातृभाषा ही प्रयोगात्मक है। इन देशो मे अंग्रेजी को महत्व दिया तो जाता है लेकिन अपनी मातृभाषा से अधिक नही।

हम भारतीय क्यो हिन्दी के वजूद की अहमियत को नही समझ पाते। हिन्दी भाषा भारत मे सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा होने के साथ-साथ देश की मुख्य साहित्यिक भाषा भी है। स्वतंत्रता संग्राम के समय हिन्दी ने ही पूरे देश को एकजूट किया था। हमारी संस्कृति और इतिहास हिन्दी के जरिए ही हम तक पँहुचा है। भारत की प्राचीनतम भाषा संस्कृत से विकसित हुई हिन्दी संस्कृत के अस्तित्व को के लिए भी जरूरी है। संस्कृत और भारतीय संस्कृति दोनो का प्रचार प्रसार हिन्दी बिना नामुमकिन है। हिन्दी से ही इनका वजूद है हमारा वजूद है।

कही देर ना हो जाये, कि हिन्दी ना घर की रहे ना घाट की।
कही गलत ना हो जाये मोहम्मद इकबाल के वो बोल
युनान ओ मिस्र ओ रोम मिट गये जहाँ से
मगर अभी तक है नामो निशान हमारा
कुछ तो बात है हस्ती हमारी मिटती नही
सदियो रहा दुश्मन दौर ए जमाना हमारा
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा

जय हिन्द….जय भारत

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