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मध्य प्रदेश का चुनावी गणित

मध्य प्रदेश चुनाव दंगल 2013

मध्य प्रदेश चुनाव दंगल 2013

मध्य प्रदेश को इन्तज़ार है नवंबर मे होने वाले लोकतंत्र के चुनावी त्यौहार का। शिवराज अपना सिंहासन बचाने के लिए गुणा-भाग करेंगे और कांग्रेस कोशिश करेगी कि वो एक बार फिर मध्य प्रदेश के रण में विजय पताका फहरा पाये। मध्य प्रदेश के चुनावी दंगल मे सभी प्रत्याशियों और दलो ने अपनी कमर कस ली है। इन्तजार है तो सिर्फ युद्ध के शंखनाद का।

मध्य प्रदेश के सियासी मैदान मे एक तरफ शिवराज की अगुआई मे मोदी की पीएम उम्मीदवारी से उत्साहीत भाजपा होगी तो दुसरी ओर केन्द्र मे चारतरफा आलोचना झेल रही कांग्रेस दस साल के वनवास को खत्म करना चाहेगी। शिवराज सिंह चौहान जहाँ सुशासन और विकास के बलबुते चुनाव मे उतरेंगे तो वही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी अपने कार्यकाल उपलब्धियों और शिवराज सरकार की खामियों को मुद्दा बनाकर चुनावी गठजोड करते दिखाई देंगे है।

पहले मुख्यमंत्री रवि शंकर शुक्ला से शुरू हुए मध्य प्रदेश के सियासी सफर मे राज्य ने अठारह मुख्यमंत्री देखें। जिनमे से बारह कांग्रेस के है तीन जनता पार्टी गठबंधन से तो चार भाजपा के कोटे से राज्य के मुख्यमंत्री बने। इनमे से सुंदर लाल पातवा एसे सीएम थे जो एक बार जनता पार्टी गठबंधन से तो एक बार अकेले भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री बने। सीएम के तौर पर सबसे लम्बा कार्यकाल दिग्विजय सिंह का है यह पूरे दस साल तक एमपी के मुख्यमंत्री बने रहे। इनके बाद शिवराज सिंह आते है जो आठ साल से सीएम की गद्दी पर काबिज है। सीएम के सबसे छोटे कार्यकाल का खिताब कान्ग्रेस के नरेश चन्द्र सिंह को जाता है जो सिर्फ तेरह दिनो के लिए मुख्यमंत्री बने। दुसरे नंबर पर आते है राज्य के पहले मुख्यमंत्री रवि शंकर शुक्ला। जो पहले विधानसभा चुनाव से इकसठ दिन के लिए ही मुख्यमंत्री के तौर पर सेवा कर पाये।

वैसे पिछले दो चुनावो के परिणाम देखे तो भाजपा इस बार भी सरकार बनाने की मजबूत स्थति मे नजर आ रही है। 2008 के चुनावो मे भाजपा को 143 सीटे मिली थी जो की 2003 विधानसभा चुनाव से 30 सीटे कम थी और इन्ही चुनावो मे राज्य मे भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस को महज 71 सीटे मिली थी जो पिछले चुनावो के मुकाबले 33 सीट ज्यादा जरूर थी पर कांग्रेस कोइ खास प्रभाव छोड़ने में नाकामयाब ही रही। 2008 के बाद का आलम यह है कि भाजपा की सीटे तो बढ़ती गई लेकिन कांग्रेस घाटे मे ही रही। तीन उपचुनावो मे बीजेपी ने आसानी से कांग्रेस के मुँह से निवाला छिन लिया। जिसके वजह से 143 का आंकडा 146 पर जा पहुँचा। उमा भारती के भाजपा मे लौटने से भारतीय जनशक्ति पार्टी का विलय भारतीय जनता पार्टी मे हुआ। उमा भारती की पार्टी के 5 विधायक बीजेपी के हुए और बीजेपी का स्कोर डेढ़ सौ के पार जा पहुँचा। दुसरी तरफ कांग्रेस का स्कोर 71 से घटकर 68 पर आ गया। उपचुनावो ने भी भाजपा के दम खम को बखूबी उजागर किया। इससे इतना तो साफ है कि दो बार के शासन के बाद मध्य प्रदेश मे बीजेपी मजबूत ही हुई है।

मध्य प्रदेश का रण वैसे तो मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होगा लेकिन साथ ही उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख क्षेत्रीय दल बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) भी एमपी के चुनावी दंगल मे जोर आजमाइश करते नजर आयेंगे। 228 सदस्यो की विधानसभा के लिए 2008 चुनाव मे बसपा ने पूरे 228 सीट पर तो सपा ने 187 सीटो पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। हांलाकि बसपा को 5 सीटो के फायदे के साथ 7 सीट और सपा को 6 सीटो के नुकसान के साथ 1 सीट से ही संतोष करना पड़ा था। उमा भारती की भारतीय जन शक्ति पार्टी ने 201 सीटो पर उम्मीदवार उतारे थे और 5 सीट पर जीत भी हासिल की। जैसे की उल्लेखनीय है उमा भारती की पार्टी का विलय बाद मे भाजपा मे हो गया था। 2008 चुनाव मे 3 सीटे निर्दलीयो ने भी जीती थी।

मध्य प्रदेश को राज्य बने 57 साल हो चुके है। 41 साल कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की गद्दी संभाली तो भाजपा को भी प्रदेश पर राज करते 12 साल हो चले है। 3 साल जनता पार्टी गठबंधन की सरकार ने भी एमपी पर अधिपत्य जमाया। सबसे लम्बे समय तक मध्य प्रदेश कांग्रेस की जांगीर रहा। जय प्रकाश नारायण की आन्धी पहली बार 1977 मे कांग्रेस को ले उढ़ी। इन्दिरा खुद तो केन्द्र से बेदखल हुई साथ में उन्ही के कारण कांग्रेस को पहली बार मध्य प्रदेश के चुनावो मे हार का सामना करना पड़ा। 1980 सत्ता मे कांग्रेस ने वापसी की। दो लगातार जीत के बाद 1990 में भाजपा ने आखिरकार म.प्र. के सिंहासन को हासिल कर ही लिया। लेकिन लम्बे समय तक गेँद भाजपा के पाले मे नही रह पायी। 2 साल बाद 1992 मे भाजपा की सरकार गिर गयी। लगभग एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद 1993 में दिग्विजय सिंह की अगुवाई मे कांग्रेस ने राज्य मे परचम लहराया। 10 साल तक सरकार चली। 2003 मे भाजपा ने वापसी करते हुए कांग्रेस को कोसो दुर छोड़ दिया था। बीजेपी की 173 सीटो के मुकाबले कांग्रेस को महज़ 38 सीटे ही मिल पाई थी।

राज्य मे शिवराज सिंह ने विकास को बढावा दिया है। कई महत्वपूर्ण योजनाएँ है जो शिवराज के मुख्यमंत्री कार्यकाल मे मध्य प्रदेश मे लायी गयी है। मुख्यमंत्री स्व रोजगार योजना, कन्यादान योजना, पिछडा वर्ग स्वरोजगार योजना, पेयजल योजना, सड़क योजना और तीर्थ दर्शन योजना जैसे तमाम कार्यक्रम शिवराज को चुनावो मे मदद करेंगे। शिवराज सरकार मे मध्य प्रदेश का विकास तो हुआ है। बीजेपी इसी मुद्दे को हर मतदाता तक पहुचाँना चाहेगी और 2013 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के अपने पक्ष मे करने की हर संभव कोशिश करेगी।

2008 मे दोबारा जीत दर्ज करने के बाद शिवराज के हौसले बुलंद है। कांग्रेस भी भाजपा के किले पर चढ़ाई करने के लिए तैयार है। शिवराज राज मे म.प्र. का विकास हुआ है। नीतियाँ और योजनाएँ भी भाजपा सरकार की वकालत करती नजर आती है। अल्पसंख्यक तबका भी शिवराज को पसंद करता है। कांग्रेस क्या तिगड़म भिड़ाती है देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि मतदाता किस तरफ हो जाये ये तय करना थोड़ा कठिन होगा। शिवराज सरकार मे खामियाँ तो है ही बस कांग्रेस इन्ही को बुनाना चाहेगी ताकि मध्य प्रदेश पर वो दस साल बाद फिर से शिकंजा कस सके।

भाजपा जीत की हैट्रिक के लिए बेताब है। कांग्रेस भी सत्ता मे वापसी को उत्सुक है। नवम्बर के चुनाव मे म.प्र. के नतीजे 2014 चुनावो पर भी प्रभाव डाल सकते है। मध्य प्रदेश के चुनावी अखाड़े के दो महाबली भाजपा और कांग्रेस आमने सामने होंगे। दस साल के काम को जहाँ बीजेपी बुनाना चाहेगी तो कांग्रेस भी दस साल के काम काज की खामियों को उजागर करती नजर आयेगी। नतीजे जो भी हो लेकिन खेल में मजा आना तो तय है।

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