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सरकार की जागीर बनी सीबीआई

सीबीआई एक तोता

सीबीआई एक तोता
pic from-www.mid-day.com

दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र आज बेबस है। जो कायदे-कानुन संविधान मे जनता की रक्षा और सुविधा को ध्यान रखते हुए रखे गये थे, जनता आज उन नियमो के कारण खुद को असहाय मान बैठने को मजबूर है। ऐसा इसलिए क्योकि इन नियमो का पालन करवाने वाले ही खुद निर्णय करने को सक्षम नही है। पुलिस हो या सीबीआई जैसी जांच एजेंसी जिन पर अपराधमुक्त भारत की जिम्मेदारी है, मौजूदा दौर मे पूरी ताकत होने के बावजूद कुछ नही कर पाते। कारण सियासत की बेड़ियो ने इन्हे बांध रखा है।

सीबीआई(केन्द्रिय अन्वेषण ब्युरो) क्योकि एक जाँच एजेंसी है इसी कारण इसकी स्वायत्ता जरूरी है। पुलिस की क्षमता से बाहर के हर केस को सीबीआई को ही रेफर किया जाता है। क्योकि अपराधी अपने राजनीतिक संम्बन्धो का फायदा उठाकर आसानी से दोषमुक्त हो सकता है। तो साथ ही खुद नेताओ पर चलने वाले मामलो की जांच की विश्वसनीयता संदेह के दायरे मे होती है। ऐसे मे सीबीआई को चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था बनाया जाना अहम मुद्दा है। ताकि राजनीतिक दांवपेच और लाभहानि से दुर सीबीआई भारत की जनता के लिए काम कर सके।

सरकार की जागीर सीबीआई

सरकार की जागीर सीबीआई
pic from-www.manjul.com

CBI(Central Bureau of Investigation) का गठन दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत किया गया था। क्योकि दिल्ली पुलिस भी केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अन्तर्गत आती है तो सीबीआई को भी निर्णय के लिए सरकार पर निर्भर रहना पडता है। आर्थिक सहायता के लिए यह जाँच एजेंसी वित्त मंत्रालय पर निर्भर है। सरकार ने सीबीआई को जड़ो से अपने शिकंजे मे ले रखा है।

वैसे तो सीबीआई पर सरकार के नियंत्रण की बात कोई नयी नही है। पर पहली बार यह खुलकर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद सामने आया। मामला था कोयला घोटाले का, इस मामले मे कांग्रेस के कोयला मंत्री और खुद प्रधानमंत्री भी संदेह के दायरे मे है। सीबीआई पर आरोप लगा कि उसने कोयला घोटाले की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट मे दाखिल करने से पूर्व युपीए सरकार के तत्कालीन कानून मंत्री अश्वनी कुमार के साथ साझा की थी। और जब सीबीआई के डायरेक्टर रंजीत सिन्हा ने इस बात को उच्चतम न्यायलय के समक्ष स्वीकार किया, तब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सरकार का तोता कहा था जो अपना मालिक की जुबान बोलता है। साथ ही सर्वोच्च न्यायलय ने सरकार को सीबीआई को स्वायत्त करने के लिए उचित कदम उठाने का आदेश भी दिया था। मामले के विवादो मे आने के बाद अश्वनी कुमार को अपनी कुर्सी से हाथ भी धोना पड़ा था।

सरकार का समर्थन करने वाले दलो के मामले मे ये तोता चूँ तक नही करता है। लेकिन जो दल या लोग सरकार के विरूद्ध है उन्हे ये तोता बक्शता ही नही है। मुलायम सिंह यादव और मायावती जब-जब सरकार के खिलाफ हुए है तब-तब सीबीआई का रूख देश की दो बडी पार्टियो के नेताओ के प्रति कड़ा हुआ है। लेकिन जैसे ही सरकार को समर्थन दिया वैसे ही सीबीआई के काले बादल इन दोनो पर से छँटे भी है। 2003 मे जब बीजेपी की सरकार थी तब मायावती पर ताज कॉरिडोर का मामला सीबीआई को सौप गया था, 2004 तक आय से अधिक संपत्ति का मामला भी मायावती के खिलाफ शुरू करने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को दी। परन्तु जैसे ही काँग्रेस की सरकार आयी तो बसपा सहयोगी बनी और सीबीआई की जाँच अधर मे लटक गयी। 2008 मे जब बसपा ने युपीए से समर्थन वापस लिया तो फिर से इस मामले मे तेजी आ गयी। लेकिन इसी समय विश्वास मत हासिल करने मे बीएसपी ने युपीए का समर्थन किया और फिर 2009 चुनाव मे संप्रग को बाहर से समर्थन जारी रखा है। बसपा इस तरह सीबीआई के चंगुल से बची रही और काँग्रेस मजे से सरकार चलाती रही।

यही हाल मुलायम बाबु का भी है। 2008 मे मुलायम पर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को दिया। जाँच बैठी और पुख्ता सबुत भी हाथ लगे। सीबीआई की तलवार सपा सुप्रीमो मुलायम पर लटक रही थी। लेकिन जब एसपी ने भी 2008 मे सरकार को विश्वास मत हासिल करने मे मदद की तो जाँच का रूख ही बदल गया। सीबीआई पलट गयी और सुप्रीम कोर्ट के सामने जाँच एजेंसी ने कहा कि मुलायम बाबू के खिलाफ ऐसा मामला बनता ही नही है। और 2009 मे जब युपीए सरकार को बाहरी समर्थन देने का ऐलान पार्टी ने किया तो सीबीआई और ज्यादा मेहरबान होने लगी।

बसपा और सपा को भी ममता बनर्जी की तरह संप्रग सरकार से शिकायत तो कई है पर क्या करे सीबीआई के चंगुल मे फसने से अच्छा तो ये कडवे घुँट पीना ही है। सरकार ने भी दोनो दलो को सरकार का संकटमोचक बना रहने के लिए तोहफा तैयार कर लिया है। मायावती और मुलायम को सीबीआई से क्लिन चिट दिलवाकर सरकार वफा का कर्ज चुकाने का मन बना चुकी है। हो भी क्यो ना एफडीआई से लेकर कई अहम मुद्दो पर संसद से वॉकआउट करके इन दलो ने सरकार की कई बार साख भी तो बचायी है। लालु की पार्टी राष्ट्रिय जनता दल भी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है। लालु को भी सरकार ने बचाना तो चाहा लेकिन लालु की खुद की बेवफाई उन्हे ले डुबी।

सीबीआई सरकार मे बैठी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलो के लिए दरियादिल है लेकिन विपक्ष और दो गठबंधन की पार्टियो के खिलाफ हमलावर भी है। हालिया दिनो मे गुजरात मे इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ केस मे सीबीआई के मोदी खिलाफ जाने पर भी आईबी(INTELEGENCE BUREU) ने मोदी सरकार का बचाव किया था। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियो की भी सीबीआई जाँच चल रही है लेकिन उनके मामले मे तो सीबीआई हाथ तक नही हिलाती है। इस सब से साफ है कि मोदी सरकार पर जाँच मे तेजी सीबीआई की जाँच के आधार पर नही केन्द्र के दबाव के कारण आयी थी। ऐसा ही कुछ INLD(INDIAN NATIONAL LOK DAL) के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला के साथ हुआ। क्योंकि INLD एनडीए की पुरानी सहयोगी रह चुकी है और बीजेपी के साथ भी पार्टी के अच्छे सम्बंध है। यही कारण है कि चौटाला और उनके बेटे समेत उनकी सरकार के कई मंत्रियो को हरियाणा में हुए शिक्षक भर्ती घोटाले मे सजा जल्द मिल पायी। झारखंड मे बीजेपी की मुख्य सहयोगी रह चुकी जेएमएम(झारखंड मुक्ति मोर्चा) के नेताओ को भी सीबीआई ने बक्शा नही है। क्योकि भारत के सभी दलो मे से सबसे अधिक 85 प्रतिशत सांसद और विधायक दागी है तो पार्टी का आये दिन सीबीआई जाँच मे किरकिरी होना आम बात हो चली थी। लेकिन बीजेपी से दुरियाँ होने पर कांग्रेस को भी नया सहयोगी नजर आ रहा है। इसी कारण जेएमएम के नये मामले आजकल सुनने को नही मिलते है।

एक तरफ अमित शाह है, तो एक तरफ सुरेश कलमाडी भी है दोनो के मामले मे सीबीआई की जाँच अलग-अलग तरिके से पूरी हुई। अमित शाह का मामला जल्द निपट गया तो कलमाडी साहब के मामले मे सीबीआई ने अच्छा खासा समय लिया। साफ है सीबीआई की लगाम सरकार अपने पास ही रखती है। सीबीआई की स्वायत्ता इसलिए भी अधर मे है क्योंकि सरकार अपनी गर्दन भी बचा के रखना चाहती है। कोयला घोटाला, टूजी घोटाला और कामनवेल्थ घोटाले मे काँग्रेस के बड़े नेता शायद इसीलिए आसानी से बच निकले। शर्मनाक है कि लोकशाही मे लोगो के साथ खुलेआम इतना बड़ा धोखा।

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था लोगो द्वारा चुनी हुई सरकार पर निगरानी रखने का प्रावधान हमारे संविधान निर्माताओ ने ही नही रखा। कानुन बनाने का अधिकार भी संसद को दिया जहाँ सत्ताधारी पार्टी का बहुमत होता है और हर फैसला भी उसी के अनुसार होना तय है। लोकपाल बिल के दौरान सीबीआई को लोकपाल के अन्तर्गत करके स्वायत्त करने की मांग उठी थी। लेकिन चोर खुद पुलिस को न्यौता देने से रहा इस बाबत ना भ्रष्टाचारनिरोधक लोकपाल कानुन आ पाया और न ही सीबीआई एक स्वतंत्र संस्था बन पायी। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस सीबीआई का दुरूपयोग दोनो ने किया है और भाजपा इस समय जो सीना ठोककर सीबीआई की स्वायत्ता की माँग कर रही है अटल जी की सरकार मे यह मुद्दा दुर-दुर तक भाजपा के एजेंडे मे था ही नही। आशा है सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह जनप्रतिनिधित्व कानुन और राईट टू रिजेक्ट के मामले मे हस्तक्षेप करके व्यवस्था परिवर्तन की आँधी सी ला दी है वही सीबीआई को भी बंद पिंजरे से बाहर निकाल पायेगी।

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