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नई राह तलाशते राहुल गाँधी

काँग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी

काँग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी

‘मेरी माँ उस दिन बहुत बीमार थी, मैने उनसे कहा कि वो अस्पताल चले लेकिन वो खाद्य सुरक्षा विधेयक को पास कराने को लेकर इतनी उत्साहीत थी कि उन्हे अपनी तबियत का कोई ख्याल ही नही था’ यह शब्द है काँग्रेस के उपाध्यक्ष या सही अर्थो मे शहजादे राहुल गाँधी के मध्य प्रदेश की एक रैली के। मोदी के भाषणों के आगे राहुल गाँधी के ऐसे बयान बेहद बचकाने से लगते है। राहुल के भाषणो मे कभी माँ तो कभी दादी और पापा की बाते सुनकर ऐसा लगता है कि वो इतिहास की दुहाई देकर लोगो पर इमोशनल अत्याचार करना चाह रहे है। मोदी के बयान पर जहाँ राजनीतिक गलियारो मे भूचाल सा आ जाता है तो राहुल के बयान से एक पत्ता तक नही हिलता है। राहुल के बयानो मे आक्रमकता होने के बावजुद जनता मे वो उत्साह दिखता जो मोदी के भाषणो के दौरान लोगो की तालियो और हुटिंग मे दिखाई देती है। सच तो यह है कि राहुल के पास ऐसा कोई मुद्दा ही नही है जिस पर जनता तालियाँ पिट सके। साथ में न ही मोदी जैसी भाषा है जो किसी मुद्दे के बिना ही लोगो को दिल खोलकर हुटिंग करने को मजबुर कर दे।

 
हास्यास्पद बात तो ये है कि वंशवाद की शिकार काँग्रेस राहुल से अच्छे वक्ताओ के मौजुद होने के बावजुद उन्हे शहजादे के स्थान पर स्टार प्रचारक के तौर पर मैदान मे नही उतार सकती है। भई राजा के स्थान पर राजकुमार ही तो बैठगा फिर चाहे महामंत्री कितना ही अनुभवी हो। लोकतंत्र मे इस परम्परा की कामना संविधान निर्माताओ शायद ही की होगी। लेकिन भाजपा को छोडकर कोई भी दल वंशवाद से अछुता नही है।

 
जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनते समय यह कल्पना किसी ने नही की थी कि उनकी बेटी फिर उनके नाती को भी भारत पर राज करने का गौरव मिलेगा। काँग्रेस भारत की सबसे पुराना दल है। आजादी के समय काँग्रेस आम-जन की सबसे बडी हितैषी पार्टी भी थी। लेकिन जब से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस राजनीति मे आयी तो इसकी लोकप्रियता तो वही बनी रही लेकिन जो काम पहले अंग्रेज करते थे उसकी कमान आजादी के उपरान्त काँग्रेस ने संभाल ली। नेहरू से इंदिरा तक काँग्रेस ठिकठाक ही थी राजीव गाँधी के समय भी काँग्रेस ने लोकसभा की 400 से ज्यादा सीटे जीतकर बाकि दलो को चारो खाने चित्त कर दिया था। लेकिन बात तो तब बिगडी जब राजीव पर भी बोफोर्स का काला दाग लगा। लेकिन आजादी से पहले और बाद मे काँग्रेस के लोगो के प्रति स्वभाव मे बड़ा फेरबदल देखा गया।

 
1991 मे नरसिम्हा राव गाँधी परिवार के बाहर शास्त्री जी के बाद दुसरे व्यक्ति थे जो काँग्रेस कोटे से प्रधानमंत्री बने। ऐसा लगा इंदिरा के प्रधानमंत्री के पीएम बनते समय काँग्रेस जिस परिवारवाद बिखर सी गयी थी शायद वो वंशवाद खत्म सा हो चला था। लेकिन काँगेस वंशवाद से ज्यादा दुर भाग ही न सकी। 1999 मे सोनिया गाँधी को काँग्रेस का अध्यक्ष बनना पार्टी मे परिवारवाद की मजबूत पकड का ही नतीजा था। फिर 2004 मे जब काँग्रेस ने केन्द्र की सत्ता मे वापसी की तो सोनिया गाँधी का प्रधानमंत्री लगभग तय था। लेकिन भला हो हमारे बाकि राजनीतिक दलो का जो सोनिया के इटली मूल की होने के कारण अड़ गये कि पीएम तो कोई भारतीय मूल का ही होना चाहिए। बेचारी काँग्रेस अध्यक्षा के हाथ निवाला तो आया लेकिन वो उसे मुहँ ना लगा पायी। सोनिया ने भी खानदानी राजनीति का दमखम खूब बेहतर ढंग से दिखाया। मनमोहन सिंह को आगे करके मैडम ने कंट्रोल तो अपने पास ही रखा। सिंह साहब भी मैडम के सबसे विश्वसनीय निकले कि उनके एक इशारे के बिना उनके पास गरदन तक हिला कीहिम्मत नही है।

 

अब राजकुमार(राहुल गाँधी) बडे हो गये तो केयरटेकर मनमोहन भी अपनी कुर्सी शहजादे को सौंपने को पूरी तरह तैयार है। प्रणव मुखर्जी जो राहुल की ताजपोशी मे रोड़ा बन सकते थे उन्हे मैडम सोनिया ने राष्ट्रपति बनाकर संतुष्ट कर दिया। पूरी काँग्रेस पार्टी मे न तो कोई विकल्प है और विकल्प है भी तो कोई अपनी इच्छा हाजिर ही नही कर पाता। बीजेपी मे मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित करने से पहले सुषमा, आडवाणी , अरूण जेटली समेत कई नामो की चर्चा थी। हो सकता है काँग्रेस के नेताओ के घर पर भी इसी तरह की चर्चा होती हो लेकिन राहुल के इलावा किसी ओर को प्रधानमंत्री पद के योग्य बताने का मतलब है मैडम की नाराजगी और करियर पर खतरा। भई मैडम को खुश रखना तो हर काँग्रेसी का कर्तव्य है। पी.चिदम्बरम, शिंदे, खुर्शीद और खुद मनमोहन सिंह भी पीएम उम्मीदवारी की पूरी योग्यता रखते है। लेकिन राहुल के अलावा काँग्रेस न तो कोई नाम सामने कर रही है और न ही मनमोहन के नाम पर ही मुहर लगा रही है।

 
राहुल के राजतिलक की खबरे पूरे मीडिया बाजार को रोशन करे हुए है, तो यह तो हो ही नही सकता कि शहजादे को इसकी खबर ही न हो। सोनिया गाँधी की कोख से जन्म लेना राहुल के लिए भाग्य का सबसे बड़ा तोहफा है। गाँधी नाम जुड़ जाने के कारण देश भर मे लोकप्रियता हासिल करना भी आसान सा हो जाता है। लेकिन लोग भी गाँधी नाम के इस धोखे से भलीभाँती अवगत होने लगे है। राहुल गाँधी को भी पता है आज नही तो कल वो पीएम बन ही जायेंगे लेकिन काँग्रेस की विश्वसनीयता का लगातार दम तोड़ना उनके लिए परेशानी की सबसे बडी वजह है। ऊपर से नेताओं के अमर्यादित बयानों से राहुल का पारा सातवें आसमां पर पहुँच ही जाता है। लेकिन राहुल बाबा करे भी तो क्या जो भी हो रहा है उन्ही की खिदमत मे लगे सेवादारों द्वारा हो रहा है।

 
नहीं पता कि टूजी से लेकर कॉमलवेल्थ और अब कोयला घोटाले मे राहुल की भुमिका थी या नही लेकिन काँग्रेस उपाध्यक्ष काँग्रेस के सकारात्मक पहलू को उजागर कर काँग्रेस की खोइ विश्वसनीयता वापस लाना चाहते है। लेकिन भ्रष्टाचार एक ऐसी बीमारी है जिसके रहते काँग्रेस की योजनएँ राहुल और काँग्रेस के तमाम नेताओं भाषणों से बाहर असल जिंदगी शायद ही कामयाब हो पाये। काँग्रेस उपाध्यक्ष मनरेगा, एनआरएचएम और खाद्य सुरक्षा विधेयक के फायदे गिनाकर जनता को चाहे बेवकूफ बना ले, लेकिन इन योजनाओ के क्रियान्वयन मे दम तोड़ चुकी व्यवस्था सबसे बडी बाधा है। जब लोकपाल बिल संसद के समक्ष पेश किया गया था तब तो राहुल मौन व्रत धारण किये बैठे थे। लेकिन जब खाद्य सुरक्षा और भुमि अधिग्रहण जैसे बिल पार्लियामेन्ट मे आते है तो राहुल इस समय काँग्रेस की पीठ थपथपाने जरूर सामने आते है। जहाँ काँग्रेस को वाह-वाही मिलनी तय होती है वही राहुल डेरा डालते है। बाकि मुद्दे जो काँग्रेस के खिलाफ है वहाँ राहुल चुप्पी साध लेते है। क्यों राहुल सीबीआई की स्वायत्ता पर कोई तीखा बयान देते।

 
यमुना मे जब-जब बारिश के समय लाखो क्युसेक पानी छोड़ा जाता है तब-तब यमुना साफ तो हो जाती है लेकिन दिल्ली के नाले उसे गन्दगी की चपेट से अलग होने ही नही देते। यही कारण है कि बारिश के बाद न तो हथिनीकुंड से पानी आता और जो यमुना मे है वो नालो के पानी मे मिलकर उन्ही के रंग मे रंग जाता है। इसी तरह केन्द्र की योजनाएँ कारगर तो है लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर व्यवस्था से मौजुद गन्दगी को दुर नही किया जायेगा तब तक इन योजनाओं का हिस्सा इनकी गरीब हकदार जनता को नही मिल पायेगा। ऊपर से कमर तोड़ महंगाई ने गरीब जनता से लेकर देश के हर वर्ग की कमर तोड़ के रखी है। राहुल को भी मालुम है कि अगर भ्रष्ट व्यवस्था मे अगर सुधार की आँधी चली तो सबसे पहले काँग्रेस के कई नेताओ को अपना शिकार बनायेगी। यही कारण है कि सीना-ठोककर अपने को गरीबो का मसीह कहने वाली काँग्रेस व्यवस्था के मुद्दे पर आकर झुठी सी लगने लगती है। जब तक राशन की दुकानो से लेकर कोर्ट-कचहरी और गाँव के स्थानीय प्रशासन मे भ्रष्टाचार व्याप्त रहेगा तब तक केन्द्र मनरेगा, खाद्य सुरक्षा और भुमि अधिग्रहण बिल अप्रासंगिक ही रहेंगे।

 
‘भारत निर्माण’ के रथ पर सवार होकर राहुल दिल्ली पर एक बार फिर काँग्रेस का झंडा लहराना चाहते है। लेकिन रैलियों मे चाहे कितना ही केंद्र की योजनाओं का बखान कर लिया जाये आम आदमी को पता है न तो उसे खाने को रोटी ही नसीब हुई और न ही रोटी के लिए कमाई का कोई साधन। हाँ अगर राहुल मम्मी, पापा और दादी का नाम लेकर भावनओं के जाल मे देश की जनता को फँसाकर गुमराह करना  चाहते है तो शायद इस बार उनका दाँव सही न पड़े। पिछली बार आडवाणी थे लेकिन इस बार मोदी है जो खुलकर जवाब देने मे विश्वास रखते है। तो चुनौती राहुल बाबा के लिए है क्योंकि वही काँग्रेस के स्टार प्रचारक है तो क्या बोलना और किस अंदाज मे बोलना है यह उन्ही का मामला है। लेकिन राहुल के हालिया भाषणो से यही दिखाई देता है कि वो सिर्फ नरेन्द्र मोदी के भाषणो से प्रतियोगिता कर रहे है। वो भी मोदी के तरह आक्रमक होने की कोशिश कर रहे है लेकिन आक्रमक तभी हुआ जाता है जब किसी मुद्दे को लेकर गुस्सा हो। लेकिन गुस्सा तो पूरे देश मे काँग्रेस के खिलाफ है और रैलियो मे आने वाली जनता भी इसी गुस्से से ग्रस्त होती है। जब गुस्सा काँग्रेस के खिलाफ हो तो पैसे देकर लायी हुई जनता का उत्साह साफ तौर पर भाजपा या किसी और पार्टी के खिलाफ नजर ही नही आता।

 

राहुल नयी राह तलाश रहे जिस पर चलकर वो गैर-काँग्रेसी दलो के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाकर काँग्रेस के वोट-बैंक को हरा भरा कर सके। राहुल बाबा नयी राहो पर चलकर काँग्रेस की कस्ती को पार लगाते है या फिर काँग्रेस के लिए खुदी खाई को और गहरा करते है यही प्रश्न काँग्रेस के रणनीतिकारो के दिलोदिमाग मे हिलोरे ले रहा है। राहे भी तो रणनीतिकारो की सलाह से तय होंगी। काँग्रेस के हर सदस्य के मन यही बात ऊथल-पुथल कर रही होगी कि कही इस बार आम-चुनावो मे भ्रष्ट व्यवस्था का काला साया और महंगाई डायन कही इस बार काँग्रेस को ही ना खा जाये।

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