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आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार

दिल्ली के नये सीएम केजरीवाल

दिल्ली के नये सीएम केजरीवाल

कुछ समय पहले ये सिर्फ सपना था कि बीजेपी और काँग्रेस जैसी पुरानी और ताकतवर पार्टियों के सामने ‘आप’ अपनी जमीन तैयार कर भी पायेगी या नहीं। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और हरयाणा की तरह इन दो दलों का घमंड दिल्ली मे भी इनकी नैया को ले डूबा। दिल्ली जैसे कम क्षेत्रफल जैसे राज्य ने पूरे देश के लोगो को आप का विकल्प उपहाल स्वरूप दिया है। चुनाव परिणाम से पहले सबके मन यही सवाल था कि आप को कितने सीटे मिलेंगी या फिर ठन-ठन गोपाल ही रह जायेगी एक साल पहले अस्तित्व मे आयी आम आदमी पार्टी। पर बिना राजनीतिक तजुर्बे वाले नेताओ के इस जत्थे ने महाबलियों के चक्रव्युह को ध्वस्त कर दिया।

‘आप’ को 28 सीटे मिलना खुद इस नये राजनीतिक दल के लिये बडी सफलता है। लेकिन 8 दिसंबर को आये नतीजे एक नये राजनीतिक समीकरणो की रूप रेखा लेकर आये। लगातार पंद्रह साल से दिल्ली के तख्त पर काबिज शीला सरकार एक पल मे नंबर 1 से नंबर 3 पर खिसक गयी। 43 सीटों वाली काँग्रेस महज 8 सीटो पर सिमट गयी। मोदी के जादू से उम्मीद लगाये बैठी बीजेपी भी AAP से महज 4 सीट दूर 32 सीटो पर जाकर रूक गयी। आम आदमी पार्टी को सिर्फ 4-5 सीटे मिलने का अनुमान था लेकिन सभी गणित के फार्मूलो को निस्क्रीय करते हुए आप ने दिल्ली की 28 सीटो पर अपना परचम लहराया। आप के नये और गैर-अनुभवी नेताओ ने कई सालो से अपनी विधानसभा सीट पर कुल्हे टिकाये बैठे कद्दावर नेताओ को धूल चटा दी।

लेकिन दिल्ली दंगल का असली रोमांच तो 8 दिसंबर के बाद शुरू हुआ। क्योंकी किसी के पास ना तो पूर्ण बहुमत था और ना ही किसी भी दल का दुसरे दल को सपोर्ट करने का स्कोप। 32 सीटो वाली सबसे बडी पार्टी बीजेपी को सबसे पहले उपराज्यपाल का निमंत्रण मिला लेकिन बीजेपी के हाथ खाली थे क्योंकि ना तो वो काँग्रेस से समर्थन ले सकती थी और ‘आप’ से समर्थन माँगना बीजेपी के लिए भीख की तरह होता। हर्ष वर्धन गये और उप राज्यपाल को ना भी कह आये। अप बारी थी दुसरे नंबर की पार्टी नयी नवेली आम आदमी पार्टी की। केजरीवाल पहले ही कसम खा चुके थे सरकार बनायेंगे तो अकेले ना ही किसी को समर्थन देंगे ना ही लेंगे। अरविन्द केजरीवाल अब तक अच्छे खासे सुऱक्षा घेरे मे थे लेकिन पूरे देश पर सालो राज करने वाली काँग्रेस पार्टी के तजुर्बे ने उसका साथ दिया। काँग्रेस ने वो दाँव चला जिससे केजरीवाल अपने ही रचे चक्रव्युह मे खुद ही फँस गये। बेशर्त समर्थन करके काँग्रस ने आप को चुनौती दी की अपनी शर्ते पूरी करके दिखाओ वरना भाग जाओ। फिर हर तरफ यही बात उड़ी की अगर केजरीवाल ने ना की तो यही माना जायेगा की केजरीवाल के वादे हवाई थे जो सिर्फ सपनो मे ही संभव है। लेकिन केजरीवाल ने भी बाकी दलो की तरह कोई गलत कदम नही उठाया। लोकतंत्र का सम्मान करते हुए केजरीवाल ने जनमत संग्रह का रास्ता अपनाया।

3 दिन तक चले जनमत संग्रह से पहले ही तमाम टिवी चैनलो ने भी सर्वे कराये जिसमे जनता ने केजरीवाल को सरकार बनाने का आग्रह किया। भ्रष्टाचार के आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी को लोगो ने सरकार बनाने की सलाह दी। इस जनमत संग्रह का सम्मान करते हुए केजरीवाल ने भी सरकार बनाने का ऐलान किया। अब सारी तरफ बस केजरीवाल का ही शोर है। कल MMRDA मे मोदी की गर्जना भी केजरीवाल के इस सुपर स्ट्रोक के सामने फिकी पड़ गयी।

बस AAP और केजरीवाल के सामने अब एक ही चुनौती होगी कि वो अपने वादे पूरे करे। वैसे भी अगर अखिलेश लैपटाप का वादा पूरा कर सकते है तो केजरीवाल तो जरूर अपने वचन पूरी शिदत्त से निभायेंगे। भ्रष्टाचार, महंगाई, गरीबी और महीला असुरक्षा के खिलाफ अरविन्द की पारी देखने लायक होगी। दिल्ली के नये मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को ढेर सारी शुभकामनाएँ और साथ ही सफलता के लिए गुडलक।

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