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मुजफ्फरनगर पीड़ित कैप बनाम सैफई महोत्सव

दंगो की आग मे झुलसा मुजफ्फरनगर

दंगो की आग मे झुलसा मुजफ्फरनगर

जश्न के नशे मे झुमता सैफई

जश्न के नशे मे झुमता सैफई

एक राज्य, दो शहर और दो बिल्कुल जुदा तस्वीरें। उत्तर प्रदेश के दो शहर आज कल की खबरों का केन्द्र बने हुए है। एक है दंगो की आग मे झुलसा मुजफ्फरनगर तो दुसरा है सूबे के मुख्यमंत्री का गाँव सैफई। एक तरफ ठंड मे टैंट को आशियाना बनाकर रहने को मजबूर दंगा पीड़ित लोग, तो दुसरी तरफ है करोड़ो के टैंट मे जश्न के नशे मे चूर समाजवाद के रहनुमा। यूपी के सिंहासन पर बैठे अखिलेश यादव को एक साल ही हुआ है। लेकिन एक साल मे ही सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री को सत्ता का नशा चढ़ चुका है। तभी तो जनाब का जो मन आता है किसी भी किमत पर वो जरूर करके रहते है।

मुजफ्फरनगर मे 2013 के सितम्बर माह मे सांप्रदायिक हिंसा ने पूरे इलाके को अपनी जकड़ मे इस तरह पकड़ा कि अभी तक उसका असर देखने को मिल रहा है। कड़कड़ाती ठंड मे दंगा पीड़ित लोग खुली छत के नीचे सोने को मजबूर है। सरकार दावा कर रही है कि उसने सभी को मुआवजा दिया है और उनके पुनर्वास की सारा इंतजाम हो गया है। लेकिन जमीनी हकिकत तो बिल्कुल अलग है। ना तो इन कैंपो मे रहने वालो को मुआवजा मिला है और जो मदद् सरकार देती भी थी अब वो भी बंद हो गयी। इस पूरे घटनाक्रम को राज्य की सत्तारूढ़ सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव के बयान ने और हवा दी। मुलायम ने राहत कैंपो मे रहने वाले लोग बीजेपी कांग्रेस के लोग बताया था जो सपा को बदनाम करने के मकसद से वहाँ रूके हुए है। इस बयान को चौतरफा आलोचना झेलनी पडी।

मुसलमान मुजफ्फरनगर की बदइंतजामी और फिर मुलायम के बयान से आहत है। सपा सरकार इतने पर संभल जाना चाहिए था लेकिन जब वक्त ही बुरा हो तो दिमाग भी काम नही करता है। सैफई महोत्सव की चमक-दमक और चाक-चौबंद इंतजामों ने मीड़िया को अखिलेश सरकार की बखिया उखेड़ने का मौका दिया। सैफई महोत्सव मे बॉलीवुड सितारो ने भी शिरकत की तो मामला और गरमाने लगा। साथ ही सपा सरकार के मंत्रियों और विधायको का विदेश दौरा भी कई सारे सवाल लेकर आया।

सैफई पर सफाई देते सीएम अखिलेश

सैफई पर सफाई देते सीएम अखिलेश

इतना सब होने के बाद अखिलेश यादव बैकफूट पर है। इस मुद्दे को लेकर अखिलेश यादव ने ही चुप्पी तोड़ी। मामले पर सफाई देने के सीएम साहब ने प्रैस कांफ्रैंस बुलाई। लेकिन यहाँ सफाई कम दी और मीडिया पर भडास ज्यादा निकाली। साफ था जनाब से कुछ बोले नही बना। अपने पुराना राग को अलापते हुए अखिलेश ने सैफई महोत्सव को युवाओ की प्रतिभा लिए अहम कदम बताया। लेकिन इस महोत्सव के टाइमिंग और इसे बनाने के तरिके पर सवाल मीडिया ने भी खुब दागे।

राजनीति मे इस तरह की संवेदनहिनता बहुत खतरनाक है। दंगा राहत कैंपो मे लोग दाने-दाने को तरस रहे है लेकिन सूबे की सरकार तो सैफई महोत्सव और स्टडी टूर मे खोयी हुई है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी को संवेदनहीन कहने वाले मुलायम इस संवेदनहीनता पर क्या जवाब देंगे। मुजफ्फरनगर के मुद्दे को सपा गम्भीरता से ले ही नही पा रही। इसी का कारण है कि बाकि राजनीतिक दल इस नाजुक समय पर भी अपनी सियासी रोटियाँ सेकने मे लगे हुए है।

राजनेता तो ऐसे ही होते है लेकिन फिल्मी कलाकारों से ये उम्मीद नही थी। वो भी संवेदनहीनता का चोला पहन इस कारवाँ से जुड़ गये। सलमान खान जो सामाजिक कार्यो के लिए काफी काम करते है काफी पुराने और समझदार चेहरे है। लेकिन उन्होने भी मुजफ्फरनगर के बारे मे कुछ नही सोचा। जब माधुरी से इस बात पर सवाल किया गया तो वो भी सफाई देने वालो मे शामिल हो गयी। लेकिन महेश भट्ट अकेले फिल्मी हस्ती है जिन्होने उनकी बेटी के इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए मीडिया के जरिये माफी माँगी। क्या इन कलाकारों के लिए पैसा ही मायने रखता है।

रोता बिलखता मुजफ्फरनगर

रोता बिलखता मुजफ्फरनगर

जो भी कुछ हो रहा है वो ना होता तो अच्छा लगता। लेकिन सरकार की लापरवाही मुजफ्फरनगर राहत कैंपो मे रह रही भोली भाली जनता के लिए घातक सिद्ध हो रही है। बच्चे मर रहे है लोग भुखे प्यासे सर्द रातो मे खुले आसमान मे तड़प रहे है। सरकार को अब जाग जाना चाहिए। सरकार को कुछ करना चाहिए।

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