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दिल्ली सरकार बनाम केन्द्र सरकार – महायुद्ध का आगाज

आंदोलनकारी मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल

आंदोलनकारी मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल

सरकार सड़क पर है, जनता घरों मे चैन की नींद सो रही है। आज जो दिल्ली मे हो रहा है शायद ही किसी ने कभी सोचा होगा। कांग्रेस के 15 साल के राज से दुःखी जनता ने इस बार केजरीवाल के विकल्प को अपने गले लगाया। लेकिन आंदोलन की आग से निकली आम आदमी पार्टी सत्ता में भी अपना जौहर दिखा पायेगी इस बात पर बराबर संदेह अभी तक क़ायम है।

8 दिसंबर को आये नतीजो से साफ था कि आप ने अपना काम कर दिया है। चाहें पूर्ण बहुमत से सिर्फ आठ सीट दूर आप का विजयरथ रूक गया हो लेकिन मात्र एक साल मे ऐसा प्रदर्शन कर दिखा आप जीत ही गयी थी। जब सरकार बनाने की उलझन मे पार्टी फँस गयी, तो फिर राजनीति की पुरानी रित इस पार्टी ने भी निभाई। जिस पार्टी को चुनाव के समय जी भर के कोसा उसी के बलबूते पहली बार दिल्ली को गैर-कांग्रसी और गैर-बीजेपी सरकार दी।

सरकार चलाना कोई बच्चो का खेल तो होता नहीं है। लेकिन शुरूआती दौर मे AAP ने अच्छा खासा प्रदर्शन किया है, लेकिन गलतियाँ भी बहुत की। लेकिन असली आफत तो अब आई है जब आधी रात मे आप सरकार के दो मंत्रियों के हाईवोल्टेज ड्रामे ने केजरीवाल के लिए नया बखेड़ा खडा कर दिया।

महिला एवं बाल विकास मंत्री राखी बि़ड़ला और कानून मंत्री सोमनाथ भारती के साथ पुलिस वालो से हुई कहासुनी तो फिर भी सही थी लेकिन सोमनाथ भारती के साथ गये आप समर्थको पर विदेशी महिला का छेड़छाड का आरोप मामले को तूल देता गया। केजरीवाल ने भी मास्टर स्ट्रोक लगाते हुए मामले में शामिल पुलिस अधिकारियों के निलंबन की सिफारिश उपराज्यपाल से कर दी।

अब पूरा मामला यही फंसा है कि उपराज्यपाल ने तो मना कर दिया। दिल्ली पुलिस केन्द्रीय गृहमंत्रालय के अन्तर्गत आती है। और गृह मंत्री अपनी राजनीतिक स्वार्थ साधने मे जुटे है। क्योंकि अगर जाँच हुई तो ये अधिकारी जाँच को प्रभावित करेंगे और फिर दोष दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर मढ़ दिया जायेगा। कांग्रेस तो चाहती ही है कि आप पार्टी बदनाम हो लेकिन दुसरो को बदनाम करते करते कांग्रेस इतनी बदनाम हो चली है कि उसका हर कदम एक चाल लगता है।

केजरीवाल को भी पता है कि वो कांग्रेस के बुने जाल मे फँसते जा रहे है। इसलिए केजरीवाल ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए अपने पसंदीदा तरीके को हथियार बनाया। सीएम ने ऐलान कर दिया कि वो गृह मंत्रालय पर धरना देंगे। केजरीवाल निकले तो थे गृह मंत्रालय के लिए। लेकिन पुलिस ने उन्हे कृषि भवन पर ही रोक दिया। पुलिस ने सोचा था कि केजरीवाल यहाँ से वापस लौट जायेंगे लेकिन आंदोलनकारी से मु्ख्यमंत्री बने केजरीवाल कृषि भवन पर ही धरना देने बैठ गये। शिंदे साहब का ये तीर बेअसर ही रहा। और फिर शुरू हुआ हाइवोल्टेज ड्रामा।

न्युज चैनल भी कांग्रेस के ऐजेंट की तरह काम कर रहे है। दामिनी गैंगरेप के वक्त आंदोलनकारियों से शिंदे साहब और शीला दीक्षित के ना मिलने पर यही चैनल थे जो इन नताओं की बखियाँ उखेड़ने की पूरजोर कोशिश मे जुटे थे। आज जब एक सीएम खुद आंदोलन कर रहा है तो मीडिया को इससे भी परेशानी है।

देश पारम्परिक राजनीति से ऊब चुका है। जो लोग आज आप को पाप कह रहे है वही कल कहते थे कि ये पार्टी भी जल्द राजनीति के रंग मे रंग जायेगी। अब क्योंकि केजरीवाल इस रंग को ही बदलने चल दिए तो अब आपु को इस बात से भी नाराजगी है। हम आप को समझ ही नहीं पा रहे। मंत्री घर मे आराम से सोए तो आप कहेंगे ये तो आ गये अपन असली रूप मे। लेकिन अगर आप सरकार के दो मंत्री रात में सड़को की खाक छानते फिरें तो भी जनता को परेशानी है कि ये तो मंत्री काम नहीं है। सरकार सड़क से नही सचिवालय से चलती है।

खैर दिल्ली सरकार की माँग को आंशिक तौर पर मान लिया गया और मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपने धरने को उपराज्यपाल की गुजारिश़ पर खत्म कर दिया। बात सिर्फ पुलिस वालों के निलंबन की नही है बल्कि एक राज्य के मुख्यमंत्री के अधिकारों की है उसकी जनता के प्रति जवाबदेही की है। उत्तर प्रदेश मे तो एक दिवार गिराने पर आईएएस अफसर को संस्पेंड कर दिया जाता है। लेकिन यहाँ तो सरकार ही बेबस है।

राजधानी होने की वजह से केन्द्र दिल्ली की पुलिस को अपने पल्लू से बाँध कर रखना चाहती है। लेकिन क्या गृहमंत्रालय पूरे देश की जिम्मेदारी से समय निकालकर दिल्ली के आम लोगों की सुनवाई कर सकता है। क्या सिर्फ मंत्रियों और केन्द्रीय कार्यालयों के दिल्ली मे होने के चलते दिल्ली की आम जनता की सुरक्षा की कोई जवाबदेही नही है। या फिर केन्द्र को दिल्ली की सरकारों पर भरोसा नही है कि वो पुलिस की जिम्मेदारी संभाल पायें। पुलिस के बिना राज्य सरकार अपंग सी लगती है। अगर कोई शिकायत है तो पहले उपराज्यपाल से कहों फिर कोई कार्रवाई होती है। इतने मे तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लेकिन दिल्ली की गुत्थी को समझना थोड़ा पेचीदा है।

अब दिल्ली की आप सरकार अगर ये कहें की ‘पुलिस तो हमारें अंडर है ही नही तो हम कानून-व्यवस्था की गारंटी दे’ तो फिर जनता कहेगी कि शीला सरकार और केजरीवाल सरकार मे क्या फर्क रह गया। फर्क ये होगा कि शीला दीक्षित आसानी से पुलिस को दिल्ली की सरकार के अधीन ला सकती थी।लेकिन अब केजरीवाल को सौ पापड़ बेलने पडेंगे तब कही एक आशा की किरण दिखाई देगी कि सीएम कानून-व्यवस्था के लिए भी जिम्मेदार है।

कांग्रेस के कुकर्मो को जनता भूलने लगी है अब आप के सुकर्मो मे त्रुटी ढुंढने मे लोग ज्यादा रूची ले रहे है। कांग्रेस खुश है जिस उद्देश्य से उसने आप को समर्थन दिया था वो अब पूरा होता दिख रहा है। आम आदमी पार्टी को भी संभल के कदम रखना चाहिए ताकि उसका दामन पाक-साफ रहे।

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