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सटीक विकल्प की विडंबना

2014 की लड़ाई- नेताओ की नहीं आम जनता

2014 की लड़ाई- नेताओ की नहीं आम जनता

नुक्कड़ पर बैठे लोग के बीच अब बातें सिर्फ राजनीति और चुनाव को लेकर होती है। नेताओं का पूरा ध्यान अब देश की जनता को लूटने से हटकर उसी जनता को मोहने मे है। मोदी बनाम राहुल की जंग तो कोसों दूर रह गयी अब तीसरा मोर्चा भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। मायावती, मुलायम से लेकर करूणानिधी और जयललिता भी बहस का हिस्सा है। चुनाव आखिरकार पाँच साल के वनवास के बाद फिर से हमारी चौखट पर आ पहुँचे है। लेकिन क्या हर बार की तरह हमारा वोट देश की लचर स्थिति पर कोई छाप छोड़ पायेगा या फिर से अगले पाँच साल जनता को वनवास भोगना पड़ेगा।

आजादी से लेकर आज तक इस देश मे सब कुछ बदल चुका है, देश का आम नागरिक अब अपने काम के बोझ से लदा होने के बावजूद देश के लिए सोच रहा है। काँग्रेस चाहे अपने आप को सैकडों साल पूराना बताकर वोट बटोरना चाहती है। लेकिन साठ साल में देश की जनता का खून पीने के बाद इस तरह के शब्द शोभा नहीं देते। आम जनता अब बदलाव के हक में है और वो पूरानी व्यवस्था से हर किमत पर छूटकारा चाहती है। काँग्रेस ने सबसे अधिक समय के लिए भारत पर राज किया है तो देश की बदहाली के लिए जिम्मेदार भी कान्ग्रेस ही है। काँग्रेस चाहे कितनी ही आलोचना झेल रही हो लेकिन इतना पक्का है कि ये पार्टी सौ सीटे पर तो जीत दर्ज कर ही लेगी। साथ ही इस बात के भी साफ संकेत है कि इस बार काँग्रेस की दाल नही गलने वाली फिर चाहे अब राहुल कितना ही छाती पीट लें।

भारतीय जनता पार्टी ही इकलौता दल है जिस पर जनता निर्भर है कि वो ही अब इस देश का उद्धार कर पायेगी। मोदी के गुजरात मॉडल के सहारें भाजपा 2014 का सफर तय करना चाहती है। भ्रष्टाचार और महंगाई भी बीजेपी के लिए मजबूत हथियार है। लेकिन येदुरप्पा को पार्टी में वापस लाकर अपने पैर कुल्हाड़ी भी मार ली बीजेपी ने जो अब काँग्रेस के लिए मजबूत तर्क बनकर उभर सकता है। साथ ही गुजरात सरकार के लोकायुक्त के चयन में हस्तक्षेप की जबरदस्ती भी किसी से छूपी नहीं है। और हाल ही में कुछ नयें खुलासे हो रहे जो गुजरात के विकास की धज्जियाँ उडा रहे है। और ऊपर से मोदी पर दंगो के दाग भी भाजपा के लिए बड़ा रोड़ा है। साथ ही ज्यादातर राज्यो मे बीजेपी नदारद है महज़ छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, गोवा और राजस्थान मे हीं भाजपा का राज है। इतनी सारी अडचनों के चलते मोदी साहब का मिशन 272+ खटाई मे भी पड़ सकता है। अब सवाल ये उठता है भाजपा नहीं तो फिर कौन ? मौजूदा समय मे लोकसभा की सीटो का अगर आकलन किया जाये तो काँग्रेस की 206 सीट के मुकाबले भाजपा की 123 सीट के आस पास कोई भी नहीं भटकता। इसका कारण ये है कि काँग्रेस और भाजपा के अलावा कोई भी पार्टी अपने अपने खास क्षेत्र से बाहर पैर नहीं जमा पायी।

ऐसे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्कसवदी) ही ऐसा दल है जो दो तीन राज्यो तक अपने पैर फैला पाया है। लेफ्ट मोर्चा इसलिए हमेशा चर्चा का विषय बना रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल मे किला ढहने के बाद अब वो भी काम का नहीं रहा है। लेफ्ट के बाद आते है मुलायम बाबू, यूपी की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी के मुखिया सिर्फ युपी के ही शेर है बाहर आते है तो कुत्ते जैसी हालत हो जाती है। मुलायम, ममता जैसे कुछ ऐसे ही घर के शेरों इस बात का हल निकालते हुए तीसरा मोर्चा बना लिया है। तीसरा मोर्चा कभी भी अपना मकसद पूरा नहीं कर पाया है, सबसे ज्यादा समय के लिए थर्ड फ्रंट 1 साल के लिए टिका था। चाहे चौधरी चरण सिंह हो या चन्द्रशेखर या वी.पी. सिंह हर कोई तीसरे मोर्चे के कंधे पर चढ़कर सत्ता तक पहुँचा तो पर कोई भी पाँच साल तक नहीं टिक सका। फिर से थर्ड फ्रंट के गूंज है। लेकिन इस बार भी कहीं ये गुब्बारा कहीं उडने से पहले ही ना फूट जायें। क्योंकि थर्ड फ्रंट के हिस्से अन्नाद्रमुक ने अभी से कुछ नया करने की ठान ली है। नवीन पटनायक, शरद पवार, ममता बनर्जी और जयललिता, अपने राज्य मे चाहे कितने ही असरदार हो लेकिन राष्ट्रीय फलक पर ना पहुँच पाने के सबसे बड़ा कारण है समझौता। क्योंकि जनता सब जनता है, ममता दीदी एकतरफ तो महंगाई का विरोध करती है लेकिन दूसरी तरफ 2009 में काँग्रेस को समर्थन देकर भ्रष्ट सरकार की मंत्री बनती है। ऐसा ही कुछ पवार साहब के साथ भी है एक समय काग्रेस का त्याग कर अलग दल बनाकर कांग्रेस को चुनौती दी, लेकिन वहीं अब महाराष्ट्र के साथ साथ केन्द्र में भी कांग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे है। लगभग हर क्षेत्रीय दल का यहीं हाल है लालच के चलते अपने सिद्दांतो से समझौता और थोडे से संतोष की आदत इन दलों की कमजोरी है।

राजनीतिक दलों के झुंड के बीच से एक दल ऐसा भी निकला है जो अब काँग्रेस और भाजपा की राष्ट्रीय उपयोगिता को टक्कर देने को उतावला है। दिल्ली की राजनीति से अब  देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी अब हाथ आजमाने को तैयार है। आप बाकी क्षेत्रीय दलो की तरह एक चद्दर से संतुष्ट होने वाली पार्टी नहीं है। दिल्ली मे जो काम 49 दिनो मे किया वो भी काँग्रेस के समर्थन देने के बाद उसने आप की हैसियत को थोड़ा ऊँचा कर दिया है। केजरीवाल की मीडिया कवरेज से इतना भी साफ हो चलता है कि पूरा देश उन्हे देख जरूर रहा है। कोई प्यार से देख रहा है और कोई गुस्से सें लेकिन चर्चा का विषय बन चले है मिस्टर केजरीवाल। आप देश की 300 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। और तैयारियों से लगता भी है कि इस बार की लोकसभा मे आप भी अहम भूमिका निभा सकती है। अन्त मे निष्कर्ष यहीं निकलता है कि देश की जनता के पास विकल्प कई है लेकिन कारगर विकल्प दो ही है। क्योंकि मायावती को वोट करने पर खिचडी ही मिलेगी, जयललिता को वोट करके भी मिक्स मसाला ही मिलेगा। यानि या तो मोदी को सर आँखो पर बैठा लो वरना तो नयें जोश केजरीवाल को आजमा लो। लेकिन पूरा देश जब किसी एक को बहुमत देगा तभी संसद मे कुछ काम हो पायेगा वरना तो फिर मिर्जी पाउडर उ़ड़ेगा, टेबल कुर्सियाँ उछाली जायेंगी।

देश की इज्जत, संसद की गरीमा, हमारा भविष्य हमारे हाथ मे है। मारो वोट की चोट, करो इस हथियार का कारगर इस्तेमाल ताकि अब बेसब्री से अगले चुनाव का इन्तजार ना करना पड़े। ताकी अब फिर पाँच साल देश बर्बाद ना हो, ताकि अगले पाँच साल हम लोकताँत्रिक भारत मे जी सकें।

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