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बनारस की सियासत के चटक रंग

शिवनगरी काशीधाम-वाराणसी

शिवनगरी काशीधाम-वाराणसी

 

काशी के घाट चाहे गंगा के प्रदुषण से बेरंग हो चले हो। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय की चमक चाहे मटमैली हो चली हो। लेकिन बनारस की सियासत इन दिनो चटक रंग से लबालब हो रखी है। हिन्दुओं की आस्था का गढ़ माने जाने वाले काशी में आजकल लोकसभा चुनाव का नशा भांग से भी ज्यादा सर चढ़कर बोल रहा है। मुरली मनोहर जोशी पर भरोसा जताने वाली बनारस की जनता फिर से तैयार है अगला सांसद चुनने के लिए।

भाजपा ने जोशी से टिकट छिनकर अपने पीएम कैंडिडेट को मैदान मे उतारा है तो आम आदमी पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल मोदी पटखनी देने के लिए काशी पहुँचे है। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने मोदी के सामने चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर तो कि लेकिन दस जनपथ के दिमाग मे ना जाने क्या तिगड़म चल रही थी कि कद्दावर नेताओं की पेशकश को किनारे रखते हुए बनारस के स्थानीय नेता अजय राय को कांग्रेस ने टिकट थमा दिया। पिछले चुनाव मे मौजूदा सांसद मुरली मनोहर जोशी के पसीने छूड़ाने वाले मुख्तार अंसारी ने हालांकि चुनाव ना लड़ने का सनसनीखेज फैसला लेकर मोदी के साथ-साथ काशी के रण मे मौजूद बाकि महारथियों को राहत जरूर पहुँचाई। बसपा ने विजय कुमार जायसवाल को काशी की कमान सौंपी है तो समाजवादी पार्टी ने भी स्थानीय नेता कैलाश प्रसाद चौरसिया को टिकट दिया है।

बनारस मे चाहे हर पार्टी अपना उम्मीदवार उतारकर काशी पर जीत के दावे ठोक रही हो, लेकिन जंग-ए-मैदान को दिलचस्प बनाने का श्रेय मोदी और फिर उनके पीछे यहाँ पहुँचे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को ही जाता है। कांग्रेस विरोधी लहर सारे भारत मे चल रही है और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के पीएम उम्मीदवार मोदी बनारस को दिल्ली पहुँचने का जरिया बनाना चाहते है। मोदी वैसे भी कट्टर हिन्दु छवि वाले नेता है और ऐसे मे काशी मोदी के पक्ष मे लामबन्द भी नजर आती है। दूसरी ओर दिल्ली विधानसभा में पहली बार मैदान में मोर्चा संभालकर धुंआधार प्रदर्शन करने वाले अरविन्द केजरीवाल है जो अदानी अम्बानी से मोदी-राहुल की मिलीभगत का दावा ठोककर पूंजीवाद के विरूद्ध मोदी लहर को रोकने के लिए मैदान में है।

एक तरफ दंगे दाग मोदी के दामन पर है तो दूसरी ओर गैर-जिम्मेदार होने का आरोप केजरीवाल के माथे मढ़ा है। एक गुजरात की धरती से काशी पहुँचा है तो दूसरा दिल्ली से काशी वापस दिल्ली पहुँचने के लिए आया है। गुजरात मॉडल मोदी को मजबूत बनाता है तो केजरीवाल की ईमानदार और भ्रष्टाचार विरोधी तस्वीर जनता को मोह लेती है। मोदी गुजरात के मौजूदा मुख्यमंत्री है तो केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री रह चुके है। बस फर्क इतना है कि मोदी 15 साल से लगातार गुजरात की कमान संभाल रहे है तो केजरीवाल ने 49 दिनो मे हीं दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। पहले केजरीवाल ही मोदी पर एकतरफा हमले करते नजर आते थे तो मोदी ने केजरीवाल को AK-47 की संज्ञा देकर दोतरफा हमलों का दौर शुरू किया।

काशी के रण के इन दो मजबूत पर इंपोर्टेड उम्मीदवारों की कुछ कमजोरियाँ भी है तो इनकी ताकत भी इन महारथियों के साथ सीना ताने खड़ी है। मोदी की कमजोरी है मुस्लिम वोट मोदी के खिलाफ है साथ ही जोशी जी के छक्के छुड़ाने वाले मुख्तार अंसारी का मैदान छोड़कर वोटों को बंटने से रूकना। मोदी की ताकत है हिन्दू वोट जो हमेशा भाजपा के साथ रहा है लेकिन इसी वोट मे जातिगत समीकरणों से पार पाना मोदी के लिए चुनौती भी है। और मोदी लहर भी नरेंद्र मोदी की दावेदारी को मजबूती देती है।

केजरीवाल की कमजोरी है कि वो स्थानीय नहीे है और साथ मे जातिगत समीकरणों को चुनौती देते दिखाई दे रहे है। और साथ ही दिल्ली के ड्रामें के बाद बिगड़ी छवि से पार पाना भी केजरीवाल के लिए बड़ी चुनौती है। केजरीवाल की ताकत है मुस्लिमों मे उनकी स्वीकृति जो मोदी के खिलाफ केजरीवाल के लिए बड़ा हथियार है। दूसरा केजरीवाल की ईमानदार छवि, जो वोटरों को आखरी वक्त मे अपना फैसला ये सोचकर बदलने की मजबूर कर सकती है कि जैसा भी है पर चोर नहीं है।

केजरीवाल ने दिल्ली में तीसरे चरण के मतदान के बाद बनारस मे डेरा डाल लिया है 23 अप्रैल को नामांकन के वक्त जो जनसैलाब उनके साथ था उसे देखकर इतना तो लगने लगा है कि हाँ मोदी को टक्कर तो मिलने वाली है। केजरीवाल के साथ में आम आदमी पार्टी के तमाम बड़े नेता भी काशी कूच कर रहे है।

मोदी ने भी काशी पर कब्जे के लिए पूरा प्लान तैयार कर लिया है। 24 अप्रैल को मोदी के नामांकन में भाजपा ने अपनी शक्ति का भरपूर प्रदर्शन भी कर लिया है। रोड शो से लेकर पर्चा दाखिल करते वक्त जाने मानें प्रस्तावकों के साथ भाजपा ने मोदी लहर की अच्छी खासी नुमाइश कर ली।

केजरीवाल और मोदी काशी के रण के स्टार उम्मीदवार है लेकिन प्रजातंत्र मे हवा का रूख नहीं आका जा सकता है। सपा, बसपा और कांग्रेस के उम्मीदवार भी काशी जीतने का दमखम रखकर मैदान में उतरेंगे। जनता अपना वोट किसे देगी ये तो वो 12 मई को ईवीएम मशीन का बटन दबाकर ही बतायेगी। काशी की सियासत इन दिनों खूब रंगीन हो चली है जो काशी की सेहत के लिए ठिक भी है।

नमो नमो या आम आदमी या फिर स्थानीय आदमी, बनारस की जनता का फैसला इन तीन के बीच होगा। काशी का फिर से चर्चा में है बनारस फिर से सुर्खियों मे है। गंगा भी मुद्दा है बनारस की साड़ियाँ भी मुद्दा है। बनारस का रण सच में बेहद दिलचस्प हो गया है।

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