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आरक्षण की आग से खेलती कांग्रेस

आरक्षण-एक आग

आरक्षण-एक आग

संविधान निर्माता बी.आर. अम्बेडकर ने कभी नहीं सोचा होगा। जिस आरक्षण के जरिए वो दलित और पिछड़ो को अत्याचारों के दलदल से निकालना चाहते थे। आज आजादी के 67 साल बाद वो आरक्षण सिर्फ वोट पाने का सबसे आसान तरिका बन जायेगा।

आजादी के समय से ही दलित आरक्षण की लड़ाई लड़ने वाले अम्बेडकर को हालांकि महात्मा गांधी के विरोध के चलते सफलता नहीं मिल सकी। गांधी आरक्षण के दुष्परिणामों को भलीभांति समझते थे। उनके अनुसार इससे दलित उत्थान तो होगा लेकिन उच्च जातियों मे दलितों के लिए जो घृणा है वो कम होने की जगह और बढ़ जायेगी। अम्बेडकर गांधी की बात से सहमत तो नही थे लेकिन वो उनके आदर के चलते हमेशा झुक जाते थे।

ब्रिटिश भारत मे ना सही स्वतंत्र भारत में अम्बेडकर की ये जिद जरूर पूरी हो गयी। संविधान निर्माता की उपाधि से सम्मानित अम्बेडकर 1947 में गाँधी की मृत्यु के बाद आरक्षण को संविधान का हिस्सा बना पाने में कामयाब रहे। संविधान सभा मे कई बार आरक्षण का प्रस्ताव गिरा लेकिन अम्बेडकर आखिर में आरक्षण को संविधान में शामिल करके ही रहे।

मूलभूत सिद्धांत यह था कि अभिज्ञेय समूहों का कम-प्रतिनिधित्व भारतीय जाति व्यवस्था की विरासत है. भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान ने पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति (अजा) और अनुसूचित जनजाति (अजजा) के रूप में सूचीबद्ध किया. संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया और इसीलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी कम रही. संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों तथा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अजा और अजजा के लिए 15% और 7.5% का आरक्षण रखा था, जो पांच वर्षों के लिए था, उसके बाद हालात की समीक्षा किया जाना तय था. यह अवधि नियमित रूप से अनुवर्ती सरकारों द्वारा बढ़ा दी जाती रही.

बाद में, अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया. 50% से अधिक का आरक्षण नहीं हो सकता, सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से (जिसका मानना है कि इससे समान अभिगम की संविधान की गारंटी का उल्लंघन होगा) आरक्षण की अधिकतम सीमा तय हो गयी. हालांकि, राज्य कानूनों ने इस 50% की सीमा को पार कर लिया है और सर्वोच्च न्यायलय में इन पर मुकदमे चल रहे हैं. उदाहरण के लिए जाति-आधारित आरक्षण भाग 69% है और तमिलनाडु की करीब 87% जनसंख्या पर यह लागू होता है

अम्बेड़कर आरक्षण के जरिए पछड़ी जातियों का उत्थान करना चाहते थे लेकिन राजनीति ने इसे केवल वोट हासिल करने का हथकंडा बना दिया। पहले पाँच वर्षो के बाद जिस आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए थी वो समीक्षा तो हुई ही नहीं बस दलित वोट बैेक हाथ से निकल जायें इसलिए भारत की सरकारें समय सीमा को बढ़ाती चली गयी।

पहले जो आरक्षण सिर्फ एससी और एसटी तक सीमित था लेकिन फिर मंडल मोरारजी देसाई की सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण पर विचार के लिए मंडल कमीशन का गठन किया। मंडल कमीशन की सिफारिशो को वी.पी. सिंह की सरकार ने लागू किया। पहले से ही मौजूद लगभग एक चौथाई आरक्षण अब ओबीसी को मिले 27 प्रतिशत आरक्षण ने आधे पर लाकर रख दिया।

आरक्षण का जबरदस्त विरोध इसे संविधान का हिस्सा बनाने से लेकर ही चला आ रहा है। सिर्फ राजनीतिक हित साधने का जरिया बना आरक्षण, उच्च जातियों को कतई रास नही आता है। कहा जाये तो आरक्षण से ऊँच-नीच की भावना घटने की बजाय बढ़ती चली गयी।

ओबीसी कोटा लागू होने के वक्त पूरे देश मे विरोध की आग फैलती चली गयी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1992 मे ओबीसी कोटे को सही ठहराया और इससे विरोध मे चल रहे आन्दोलन पर ब्रेक लग गया।

समय समय पर आरक्षण के कारण देश मे अशांति का माहौल बना। जाट आरक्षण से भी सरका्र ने सबक नहीं सिखा। हरियाणा के जाट बस, रेल सब ठप करके बैठ गये और आखिर में सरकार ने उनकी माँगे मान भी ली। ओबीसी कोटे में जाटों को जगह दी गयी।

सत्ता मे बैठा दल हमेशा आरक्षण को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करती रही है। कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का पासा फेंककर धर्म आधारित आरक्षण को हवा देने की कोशिश जरूर की लेकिन कांग्रेस की ये चाल फुस्स हो गयी।

अब यही कांग्रेस लोकसभा चुनाव मे मिली करारी हार के बाद फिर से आरक्षण के पैंतरे का इस्तेमाल करने जा रही है। महाराष्ट्र में मिली करारी हार के बाद मराठा आरक्षण का दाँव खेलकर कांग्रेस महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले छक्का जड़ना चाहती है। 20 प्रतिशत आरक्षण का लालीपॉप थमा कर फिर से कांग्रेस सत्ता मे वापसी करना चाहती है।

कांग्रेस के इस कदम का राजनीतिक विरोध भले ही ना हो रहा हो। पर सोशल मीडिया पर कांग्रेस की जमकर आलोचना हो रही है। अलग से 20 फिसदी मराठा आरक्षण ने आरक्षण के विवादास्पद मुद्दे को फिर से हवा दी है।

देखा जाये तो कांग्रेस ही क्या हर राजनीतिक दल आरक्षण के जरिए अपनी दुकान चमकायेॆ हुए है। कांशीराम, मायावती की तो नींव ही दलित राजनीति है। उत्तर प्रदेश की सियासत के माहिर खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव और बिहार की राजनीति के धुरंधर नीतिश कुमार, लालु यादव की दुकान चमकी ही ओबीसी आरक्षण के चलते। देश के अलग अगल हिस्सो मे वोट के लिए निरन्तर अलग-अलग जातियों को आरक्षित श्रेणी मे रख दिया जाता है। वोट हासिल करना का बड़ा आसान तरिका बन कर उभरा है आरक्षण।

आरक्षण तो वो आग है जिसपर हर कोई अपनी रोटियाँ सेकने की जुगत मे है। कोई इसमें घी भी डाल देता है। तो कोई दूर से ही बिना इसकी तपीश महसूस किये इसका विरोध करता है। कहा जाये तो किसी भी राजनीतिक दल की इतनी हिम्मत नहीं है कि वो आरक्षण को खत्म कर दे क्योंकि इससे दलित और ओबीसी का बड़ा वोटबैंक खिसक जाने के पक्के आसार है।

कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने हाल ही मेे जातिगत आरक्षण को समाप्त कर आर्थिक तौर पर आरक्षण देने का सुझाव दिया था। लेकिन उन्ही की पार्टी ने इस तरह की मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद जनाब तो कही गायब से ही हो गये है।

राजनीति के चलते शायद ये कभी मुनासिब हो ही ना पायेगा। लेकिन उम्मीद है कि एक दिन इस बन्दरबाँट पर रोक लगेगी। प्रतिभा की राह मे सबसे बड़ा रोड़ा आरक्षण है। सही अवसर ना मिलने पाने का कारण है आरक्षण, आरक्षण जहर नहीं आग है जो पूरे जंगल को तबाह कर सकता है।

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