सामग्री पर जाएं
Advertisements

नयी सरकार के सामने सुखे का डर

अच्छे दिन मे सुखे का रोड़ा

अच्छे दिन मे सुखे का रोड़ा

इस बार मानसून के कुछ कमजोर रहने की भविष्यवाणी मौसम विभाग पहले ही कर चुका था। तब उसने सामान्य से पांच फीसद कम बारिश होने का पूर्वानुमान जाहिर किया था। अब उसने इस कमी में दो फीसद का और इजाफा कर दिया है, यानी इस साल बारिश सामान्य से सात फीसद कम हो सकती है।

सोमवार को ताजा अनुमान जारी करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने कमजोर मानसून के मद््देनजर एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी इसका संकेत था। यों मौसम विभाग की भविष्यवाणी हर बार सही साबित नहीं हुई है। लेकिन उसने बरसात की संभावित स्थिति जानने की बाबत अपनी क्षमता बढ़ाई है, सोलह मानकों वाले उस अध्ययन-मॉडल को अपनाया है जिसे दुनिया भर में सबसे वैज्ञानिक तरीका माना जाता है।

फिर, जिस अल नीनो प्रभाव बढ़ने के कारण भारत समेत दक्षिण एशिया में किसी हद तक सूखे की आशंका जताई जा रही है, उसके बारे में मौसम-अध्ययन से जुड़ी कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां पहले ही आगाह कर चुकी हैं। उनके मुताबिक अल नीनो कारक के प्रभावी होने का अनुमान सत्तर फीसद तक है। लिहाजा, मौसम विभाग की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

कई जानकारों का मानना है कि मानसून के पांच या सात फीसद कमजोर रहने से कोई चिंताजनक स्थिति नहीं आएगी। पर डर सिर्फ बारिश के सामान्य से कुछ फीसद कम होने का नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग के दौर में मौसम के उतार-चढ़ाव की तीव्रता बढ़ती जा रही है। सामान्य बरसात भी अगर व्यतिक्रम के साथ हो तो फसलों को नुकसान पहुंचना अवश्यंभावी है। पिछले साल अच्छी बरसात हुई, पर मानसून की अवधि बीत जाने के बाद भी उसके बने रहने और इस साल गरमी की शुरुआत से ऐन पहले तक जब-तब होती रही बारिश ने रबी की फसल को नुकसान पहुंचाया। अब चिंता खरीफ को लेकर है।

मानसून के कमजोर रहने पर महंगाई और बढ़ सकती है, जो कि पहले ही बेहद चिंताजनक स्तर पर है। विकास दर को पटरी पर लाने की कोशिशों को भी झटका लग सकता है। पर सूखे का मामूली अंदेशा भी बहुत डरावना लगता है तो इसलिए कि हम पानी को बचाने और सहेजने की परवाह नहीं कर रहे हैं। पानी की बर्बादी रोजाना हर तरफ दिखाई देती है। नदियां प्रदूषित होती गई हैं और झीलों-तालाबों को पाट कर वहां औद्योगिक इकाइयां, कॉलोनियां बनाने का सिलसिला जारी है।

फिर, दशकों से हमने ऐसी कृषि प्रणाली को बढ़ावा दिया है जिसमें सिंचाई के लिए बेहिसाब पानी की जरूरत पड़ती है। ऐसे में भूजल का अंधाधुंध दोहन होता रहा है, देश के बहुत सारे इलाकों में धरती का घड़ा तेजी से खाली होता जा रहा है। कीटनाशकों और रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल की वजह से कई जगह आसानी से उपलब्ध पानी भी मुफीद नहीं रह गया है। औद्योगिक इकाइयां ढेर सारा पानी इस्तेमाल करती हैं और उसे विषैला बना कर छोड़ देती हैं।

इस सब के बरक्स पानी के बाजारीकरण ने भी मुश्किलें और बढ़ाई हैं। पानी को एक उत्पाद मानने की दलील दी जाने लगी है। लेकिन पानी हर इंसान की जरूरत है, चाहे किसी की कोई क्रय-शक्ति हो या न हो। फिर पानी पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों, फसलों की भी जरूरत है। मौसम पर हमारा वश नहीं है, पर पानी को बचाने और इस्तेमाल करने का विवेक फले-फूले तो मानसून में पांच या सात फीसद की कमी खास परेशानी का सबब नहीं हो सकेगी।

courtesy- http://www.jansatta.com

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: