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ईराक हिंसा से सहमी दुनिया- इस्लाम बनाम जिहाद

गृहयुद्ध की आग से धदकता ईराक

गृहयुद्ध की आग से धदकता ईराक

सद्दाम को फांसी देने के बाद जब लगने लगा कि पूरे इराक में शियाओं का वर्चस्व स्थापित हो गया है लेकिन यह वास्तव में ऐसा नहीं था। हालांकि शियाओं ने भी इसको इसी रूप में लिया और प्रचारित किया। उनका सुन्नियों से वैमनस्य बढ़ता गया। सुन्नियों ने इराक की नई सरकार को कभी मन से अपनी सरकार नहीं माना इसलिए बाद में जब यह सरकार खुलेआम सांप्रदायिक विद्वेष के आधार पर काम करने लगी तो उनके बीच से रहे-सहे उदारपंथी तत्व भी गायब हो गए। हाल के चरमपंथी सुन्नी उभार का नेतृत्व कभी अल कायदा से जुड़ा रहा अबू बकर अल बगदादी संभाल रहा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह ओसामा बिन लादेन का सच्चा उत्तराधिकारी है।

इराकी सरकार का यह भी आरोप है कि आईएसआईएस जैसे संगठनों को सऊदी अरब और अन्य सुन्नी मुल्कों से सहायता मिल रही है। उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब दुनिया का सबसे धनवान सुन्नी देश है और वह सारी दुनिया के सुन्नी संगठनों को खैरात बांटने का काम करता है। लेकिन इराक का यह संकट पूरे पश्चिम एशिया में शिया-सुन्नी टकराव को तीखा बनाएगा, जिसका सीधा असर दुनिया की तेल सप्लाई पर पड़ सकता है। भारत समेत पूरी दुनिया में तेल की कीमतों पर इसका असर अभी से देखा जाने लगा है। जाहिर है, इस समस्या के हल के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। तभी कुछ संभव है कि जब विश्व के संगठन और देश इस मामले में दखल दें।

मौत से कांपता ईराक

मौत से कांपता ईराक

ऐसी कोशिशें भी करनी होंगी कि सांप्रदायिक विभाजन को ज्यादा हवा न मिलने पाए क्योंकि अगर ऐसा होता है तो इराक भी लेबनान जैसे दशकों लंबे गृहयुद्ध में उलझ सकता है और मंदी से उबरती दुनिया के लिए यह बहुत बड़ा संकट होगा। अप्रैल 2003 में सद्दाम हुसैन के सत्ता से बेदखल होने के बाद से ही इस बात का अंदाज़ा लगने लगा था कि अब भविष्य में इराक की सत्ता की जंग स्थानीय शिया व सुन्नी समुदायों के मध्य अवश्य छिड़ेगी।

सद्दाम हुसैन अरब सुन्नी समुदाय के एक सैन्य तानाशाह थे जिन्होंने अहमद हसन अल बक़र से 16 जुलाई 1979 को सत्ता संभालने के बाद अपनी सैन्य शक्ति के बल पर 9 अप्रैल 2003 तक इराक़ पर शासन किया। इराक में शिया मुस्लिम समुदाय के लोगों की आबादी 60 प्रतिशत है जबकि सुन्नी समुदाय की आबादी 31 प्रतिशत है। अपने शासनकाल के दौरान सद्दाम हुसैन ने न ही शिया समुदाय के लोगों को सिर उठाने दिया न ही सुन्नी व कुर्द समुदाय के अपने राजनैतिक विरोधियों को किसी भी प्रकार के विरोध को सिर उठाने दिया। जि़द्दी स्वभाव के सद्दाम हुसैन ने 24 वर्षों तक अपनी तानाशाही प्रवृति व क्रूरता के बल पर अपने सभी विरोधियों को बखूबी बलपूर्वक कुचला।

बहरहाल, सद्दाम हुसैन की इसी क्रूरता व तानाशाही प्रवृति ने अमेरिका को एक उपयुक्त बहाना उपलब्ध करा दिया और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध छेडऩे वाला अमेरिका अफगानिस्तान से होते हुए इराक तक जा पहुंचा। निश्चित रूप से 2003 से लेकर अब तक इराक़ में लाखों लोग हिंसा के शिकार हो चुके हैं। सद्दाम के सत्ता से हटते ही तथा अमेरिकी फौजों की इराक़ में मौजूदगी के दौरान ही बड़ी से बड़ी तमाम सांप्रदायिक हिंसक घटनाएं हुई हैं। भीड़ भरे बाज़ार, धार्मिक जलसा व जुलूस, दरगाहों, मस्जिदों और मकबरों को आत्मघाती विस्फोटों का निशाना बनाया गया।

इस दौरान अमेरिका में स्थानीय स्तर पर बहुत तेजी से आवाजें उठाई जाने लगीं कि अमेरिकी फौजों की इराक में मौजूदगी गैरजरूरी है और राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने भी अपने चुनाव के दौरान अमेरिकी जनता से इराक से अमेरिकी फौज की वापसी का वादा किया। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को ‘ठिकाने’ लगाने व तेल दोहन जैसे अपने मकसद को पूरा कर अपने अंतिम सैनिक की इराक से वापसी घोषित कर दी। निश्चित रूप से अमेरिका ने इराक में अपनी मौजूदगी के दौरान वहां सभी समुदायों की मिली-जुली गठबंधन सरकार बनवाने से लेकर सामुदायिक हिंसा नियंत्रित करने तक में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान अमेरिका के भी हज़ारों सैनिक मारे गए।

अपनी ही आग मे जलता ईराक

अपनी ही आग मे जलता ईराक

पर इस बीच पूरे इराक में सांप्रदायिक तनाव काफी बढ़ गया और हिंसक वारदातें भी होती रही हैं। राजधानी बगदाद समेत देश के सभी इलाकों में भीषण बम धमाके हुए हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और घायल होने के समाचार आते रहे हैं। इराक के राजनीतिक हालात यह समझ पाने के लिए काफी हैं कि इराक के गृहयुद्ध की ओर बढ़ने की संभावना अत्यंत प्रबल है। यहां इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि इराक के वर्तमान हालात अथवा वहां की गृहयुद्ध जैसी स्थिति या फिर सद्दाम हुसैन का 24 वर्षों का तानाशाही से भरा हुआ शासनकाल का केवल इराक की आंतरिक राजनीति से ही मात्र मतलब नहीं बल्कि इसका पूरे मुस्लिम जगत विशेषकर अरब जगत का भी इस घटनाक्रम से सीधा संबंध है।

मुस्लिम जगत के यह दो प्रमुख धड़े शिया व सुन्नी दोनों ही इराक पर वर्चस्व की लड़ाई केवल इराक़ की सत्ता के लिए ही हासिल नहीं करना चाहते बल्कि इस रास्ते पर चलते हुए यह दोनों ही समुदाय अरब जगत में भी अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। वर्चस्व की इसी लड़ाई के रास्ते पर चलते हुए 22 सितंबर 1980 से लेकर 20 अगस्त 1988 तक ईरान इराक़ के मध्य प्रथम फारस खाड़ी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुआ भीषण सैन्य युद्ध भी हो चुका है।

उस समय अमेरिका सद्दाम हुसैन के सहयोगी की भूमिका में था। जब 8 साल की लड़ाई के बाद दोनों ही देश काफी कमजोर हो गए तथा एक-दूसरे से हार मानने को भी तैयार नहीं हुए तब कहीं जाकर ईरान व इराक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 598 के तहत युद्ध विराम पर राजी हुए थे। सद्दाम हुसैन के शासन के समय उसे अरब जगत के कई सुन्नी बाहुल्य देशों का भी पूरा समर्थन प्राप्त था। यह समर्थन उसे केवल इसीलिए था क्योंकि सद्दाम हुसैन एक सुन्नी अरब तानाशाह थे। परंतु जब सद्दाम हुसैन ने अपनी अड़ियल व तानाशाही प्रवृत्ति का प्रदर्शन अरब जगत के शासकों को आंखें दिखाते हुए किया तथा अपनी सेना 1990 में कुवैत पर कब्जा जमाने की गरज से वहां भेज दी तब कहीं जाकर अरब के अन्य तानाशाहों को सद्दाम हुसैन की दूरगामी राजनीतिक महत्वाकांक्षा तथा उसकी वास्तविक हकीकत का पता चला।

उसी समय से अरब जगत के कई देश सद्दाम हुसैन के खिलाफ हो गए और सद्दाम के इसी अकेलेपन का फायदा 2003 में उसी अमेरिका ने उठाया, जिसने कि 1980 में छिड़े ईरान-इराक युद्ध में सद्दाम की पीठ थपथपाई थी। उधर ईरान, इराक स्थित शिया गुटों से अपनी पूरी हमदर्दी रखता है तथा कथित रूप से उन्हें सहयोग व समर्थन भी देता है। ऐसे में इराक के वर्तमान तनावपूर्ण हालात में भी ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह अलग बात है कि ईरान की इराक में भविष्य की संभावित दखलंदाजी को अमेरिका किस प्रकार लेता है। जो भी हो आने वाले दिन इराक के लिए बेहद खतरनाक हो सकते हैं और इराक गृहयुद्ध की भेंट चढ़ सकता है।

ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि यदि इराक में भीषण नरसंहार सत्ता को लेकर होता भी है तो इसके बाद क्या इराक की सत्ता किसी एक समुदाय के वर्चस्व वाली सत्ता उसी प्रकार हो जाएगी जैसे कि सद्दाम हुसैन के शासनकाल में रही? या फिर इराक की एकता व अखंडता छिन-भिन्न हो जाएगी और पश्चिमी देशों की मंशा के मुताबिक इराक भी तीन हिस्सों में बंटकर अपने उस भारी-भरकम वजूद से हाथ धो बैठेगा जो कि पश्चिमी देशों की आंखों की भी किरकिरी बना रहा था। फिलहाल यह सभी संभावनाएं भविष्य के गर्भ में हैं।

Courtesy- http://hindi.webdunia.com/

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