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हिंदी के अच्छे दिन कब आयेंगे ?

 

हिंदी के अच्छे दिन कब आयेंगे ?

हिंदी के अच्छे दिन कब आयेंगे ?

यह हैरत की बात नहीं कि केंद्रीय स्तर पर हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की पहल पर तमिलनाडु से विरोध के स्वर उठे हैं। साठ के दशक में तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी आंदोलन चला था और द्रमुक ने उसकी अगुआई की थी। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और द्रमुक नेता करुणानिधि ने मोदी सरकार की पहल को अन्य भाषाभाषियों के प्रति भेदभाव भरा करार दिया है। हिंदी-विरोध न सिर्फ द्रमुक बल्कि तमिलनाडु की राजनीतिक अस्मिता का अंग रहा है। इसलिए जयललिता भी पीछे नहीं रहीं। प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर उन्होंने भी विरोध जताया है।

इसी सुर में सुर मिलाते हुए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी केंद्र पर दूसरे राज्यों पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया है। इस तरह हिंदी को लेकर केंद्र का उत्साह विवाद का विषय बन गया है। भारत बहुभाषी देश है और संविधान की आठवीं अनुसूची में सभी राज्यों की भाषाओं को मान्यता मिली हुई है। इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच भाषाई संबंध हमेशा जटिल रहा है। निश्चय ही इसे सुलझाने की कोशिश ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे गैर-हिंदी भाषियों को लगे कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है या उन पर हिंदी थोपी जा रही है। वरना उलटी प्रतिक्रिया होगी। इस तरह हिंदी का कोई भला शायद ही हो, अंगरेजी का वर्चस्व बनाए रखने की दलीलों को ही बल मिलेगा। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मातृभाषा यों तो गुजराती है, पर वे हिंदी में भी सहजता महसूस करते हैं। गैर-हिंदी राज्यों से आने वाले राजनीतिकों और प्रतिनिधियों के साथ वे अंगरेजी के बजाय हिंदी में संवाद करना पसंद करते हैं। विदेशी मेहमानों के साथ बातचीत में भी वे कई बार हिंदी को जरिया बना चुके हैं। यह उनका हिंदी-प्रेम भी हो सकता है और अंगरेजी में निष्णात न होना भी। फिर भी इस पर शायद ही किसी ने एतराज जताया हो।

विवाद की शुरुआत तब हुई, जब केंद्र ने सभी मंत्रालयों और विभागों के बीच पत्र-व्यवहार के लिए हिंदी को तरजीह देने का निर्णय किया और गृह मंत्रालय ने उन्हें निर्देश जारी कर कहा कि वे सोशल मीडिया के अपने पन्नों पर संबंधित सामग्री अंगरेजी के अलावा हिंदी में भी दें, बल्कि हिंदी को वरीयता दें। इस निर्देश से ऐसा लगा होगा कि जो अधिकारी हिंदी में काम करने में सक्षम नहीं हैं

उनके लिए मुश्किल पेश आने वाली है और उन्हीं अफसरों को तवज्जो मिलेगी जो हिंदी में दक्ष होंगे। विरोध के सुर उठने के बाद गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के निर्णय को अन्य भाषाओं को कमतर आंकने के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। पर साथ ही दोहराया कि उनकी सरकार सभी विभागों और सार्वजनिक जीवन में हिंदी के इस्तेमाल पर जोर देगी। लेकिन कोई भेदभाव महसूस न करे, इसके लिए हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं की भी हिस्सेदारी बढ़ाने की नीति अपनानी होगी। प्रशासन, न्यायपालिका, शिक्षा-दीक्षा में उनका इस्तेमाल बढ़ाना होगा। सबसे पहला तकाजा सभी जगह मातृभाषा को प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का माध्यम बनाने का है।

कुछ साल पहले मद्रास हाइकोर्ट के मदुरै खंडपीठ के वकीलों ने इस मांग को लेकर कई दिन तक धरना दिया था कि उन्हें अंगरेजी में अपना पक्ष रखने की अनिवार्यता न हो, वे चाहें तो तमिल में बहस कर सकें। यह घटना इस बात का एक उदाहरण भर है कि भारतीय भाषाओं को मान दिलाने की चाहत दक्षिण समेत गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लोगों में भी है। अलबत्ता उन्हें इस बात का अंदेशा जरूर सताता है कि हिंदी उन पर हावी न हो जाए।

हिंदी अधिकांश भारत में लोक-संपर्क की भाषा है। अपनी इस भूमिका के बूते और सिनेमा, मीडिया आदि के जरिए उसका प्रसार बढ़ता गया है। पर एक मुकम्मल भाषा नीति वही कही जाएगी जिसमें हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं को भी उचित जगह मिले।

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