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मोदी सरकार के तीस दिन – अच्छे दिन अभी दूर है ?

एक महीने की हुई मोदी सरकार

एक महीने की हुई मोदी सरकार

अच्छे दिन आने वाले हैं से लेकर अच्छे दिन आ गए हैं और कहां हैं अच्छे दिन। रेडियो, एफएम, टीवी चैनल लतीफों के तमाम कार्यक्रम अखबार राजनीतिक बहसबाज़ी इन सबमें अच्छे दिन आ गए हैं को लेकर इतने प्रयोग हो रहे हैं कि एक दिन यह स्लोगन ही मुद्दा न बन जाए।

चुनाव से पहले अच्छे दिन आने वाले हैं कि एकमुश्त समझ यही थी कि मनमोहन सिंह की सरकार जाए और व्यवस्था बदले। इन पांच सालों में अच्छे दिन को लेकर जो भी व्याख्या होगी वो व्यक्तिगत से लेकर सामूहिक स्तर पर इतनी व्यापक होगी कि अभी से ही इसकी सफाई देते देते विभिन्न स्तरों पर संबंधों में भी कड़वाहट पैदा होने लगी है।

एक परिपक्व लोकतंत्र में मतदाता और नागरिक समूह से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वो किसी सरकार के काम का मूल्यांकन करते वक्त सरकार को मिलने वाले समय संदर्भ और कई पहलुओं को भी ध्यान में रखें। लेकिन यह छूट किसी सरकार को क्यों मिले। क्या बीजेपी ने विपक्ष में रहते हुए ऐसी रियायत मनमोहन सरकार या राज्यों में किसी अन्य सरकारों के साथ बरती थी।

चुनावों के दौरान विपक्षी नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी ने खुद को एक रफ्तार के प्रतीक के रूप में भी पेश किया था। उनके प्रचार भाषणों में इंतज़ार और सब्र की कोई जगह नहीं थी। देश अब इंतज़ार नहीं कर सकता के इस दौर में रेल किराया बढ़ने के साथ लोग ट्वीटर के गर्त से 2012 का मोदी का ही ट्वीट निकाल कर बांटने लगते हैं कि तब तो आपने विरोध किया था कि संसद से पहले कैसे बढ़ गया किराया और खुद बढ़ा दिया।

तब सरकार की हल्की सी झुंझलाहट भी दिखती है जब यह कहा जाने लगता है कि कड़ा फैसला है, मगर सही है और विश्वव्यापी रेल व्यवस्था के लिए ज़रूरी है। हफ्ता भी नहीं गुज़रता है कि महाराष्ट्र के चुनावों को देखते हुए लोकल ट्रेनों का किराया वापस ले लिया जाता है। मगर यह छूट अन्य राज्यों के यात्रियों को नहीं मिलती है। तीन महीने तक गैस के दाम नहीं बढ़ाये जाने का एलान हो जाता है क्या यह चुनावी फैसला नहीं है जो पिछली सरकार भी लिया करती थी।

आज आरएसएस के एमजी वैद्या का बयान है कि मोदी ने 100 दिन मांगे थे, एक महीना नहीं लोगों को उन्हें आंकने से पहले कुछ इंतज़ार करना चाहिए। आज ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिन्दी में नहीं बल्कि अंग्रेजी में ब्लॉग लिखा है।

डीयर फ्रेंड्स को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी लिखते हैं कि आज हमारी सरकार ने एक महीना पूरा किया है। 67 साल की सरकारों का एक महीने की सरकार से मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। एक महीना पहले जब हमने ज़िम्मा संभाला तो मैं सोच रहा था कि मैं इस जगह के लिए नया हूं और कुछ लोग मान रहे हैं कि केंद्र सरकार में काम करने की बारीकियों को समझने में ही मुझे कम से कम एक साल लग जाएगा। सौभाग्य से एक महीने बाद ये विचार अब मेरे मन में नहीं है।

दिल्ली में मैं एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा हूं और वो ये है कि कुछ चुने हुए लोगों को हम देश में एक सकारात्मक बदलाव से जुड़े अपने इरादों और उनकी गंभीरता के बारे में बताने की कोशिश कर रहे हैं। ये वो लोग हैं जो सरकारी सिस्टम के अंदर और बाहर दोनों जगह मौजूद हैं। बीते महीने में ऐसे कई मौके आए जिनसे हमारी सरकार का कुछ लेना−देना नहीं था फिर भी ये विवाद बने हुए हैं। मैं किसी को दोष नहीं देता, लेकिन ये महसूस करता हूं कि हमें ऐसे सिस्टम मज़बूत करने चाहिए जिनसे सही लोगों तक सही समय पर सही बातें पहुंचाई जा सकें। उम्मीद है तब कुछ बदलाव होगा।

हर नई सरकार के लिए मीडिया के दोस्त हनीमून पीरियड का इस्तेमाल करते हैं। बीती सरकारों को ये छूट थी कि वो इस हनीमून पीरियड को सौ दिन या उससे भी ज़्यादा आगे तक बढ़ा सकें। ये अप्रत्याशित नहीं है कि मुझे ऐसी कोई छूट नहीं है। सौ दिन भूल जाइए सौ घंटे के अंदर ही आरोपों का दौर शुरू हो गया। लेकिन जब कोई राष्ट्र की सेवा करने के एकमात्र उद्देश्य से काम कर रहा हो तो इस सबसे फ़र्क नहीं पड़ता। यही वजह है कि मैं काम करता रहता हूं और उसी से मुझे संतुष्टि मिलती है।

इस ब्लॉग को बार-बार पढ़ने की ज़रूरत है। वैसे इन तीस दिनों में सरकार ने काफी कुछ किया है। अपनी प्राथमिकताएं तय की हैं कई संस्थानों के दौरे किए गए हैं, कई फैसले भी हुए हैं। विदेश नीति की तारीफ हुई है। इस नज़र से देखिये तो काफी कुछ ठीक दिशा में है। महंगाई का मसला ज़रूर है जिसे कम होने का इंतज़ार लोग रोज करते हैं और जिसके कम न होने पर बीजेपी विपक्ष के दिनों में रोज आंदोलन किया करती थी तब भी जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां सरकार के बस में नहीं होती थीं।

अगर उच्च स्तरीय बैठकें हो रही हैं तो उनके नतीजे में दूधचीनी डीजल पेट्रोल रेल किराया आदि से लेकर इत्यादि के दाम कैसे बढ़ रहे हैं। मॉनसून की कमी और इराक की चुनौती सामने आ गई है। लेकिन महंगाई तो तब भी बढ़ा करती थी जब मॉनसून ठीक हुआ करता था। क्या वाकई सरकारों के पास महंगाई कम करने के उपाय होते हैं। उस सरकार की तरह इस सरकार ने भी कहा कि राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि जमाखोरों को पकड़ा जाए। उस सरकार में कितने जमाखोर पकड़े गए थे और इस सरकार में कितने पकड़े गए हैं, यही अभी तक पता नहीं मगर आज सरकार ने राज्यों को कह दिया कि जमाखोरों और कालाबाज़ारियों के खिलाफ मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए विशेष कोर्ट बनाया जाए।

प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट से आपराधिक मामलों के आरोपी सांसदों के मामले को एक साल में निपटाने की बात कही थी। क्या इनके लिए सुप्रीम कोर्ट को लिखा गया है।

एक मंत्री पर बलात्कार के आरोप एक मंत्री के हलफनामे में अंतर के आरोप एक मंत्री का सेना की एक टुकड़ी को डकैतों की टोली कह देने क्या इन सब विवादों का संबंध वाकई सरकार से नहीं था। सरकार का नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति क्या नज़रिया है उसे लेकर भी राजनीतिक और पेशेवेर नज़रिये से सवाल हो रहे हैं।

मंत्रियों के प्राइवेट सेक्रेटी रखने के मामले में भी पीएमओ हस्तक्षेप करता है तो प्रधानमंत्री अपने प्रधान सचिव की नियुक्ति के लिए अध्यादेश का सहारा लेते हैं। सचिवों से मुलाकात कर पेशेवर और निर्भीक कदम उठाने का मंत्र देते हैं तो गुजरात कॉडर के अफसरों को भी ले आते हैं। पीएमओ में एक अधिकारी की नियुक्ति होती है, लेकिन सार्वजनिक सूचना जारी होने के अगले दिन रद्द हो जाती है।

क्या तीस दिन में इतना सवाल पूछ कर हम ज्यादती नहीं कर रहे हैं। वैसे एक आदमी ने ज्यादती नहीं की है। राहुल गांधी ने। उन्होंने इन तीस दिनों में एक भी सवाल नहीं किया है। फिर मोदी से सवाल कौन कर रहा है। सोशल मीडिया टीवी या टीवी के जरिये पब्लिक।

लेखक – रवीश कुमार

courtesy – http://khabar.ndtv.com/

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