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2014 चुनाव में क्षेत्रीय दल क्यों हुए ठन ठन गोपाल ??

बेअसर हो चुकीं क्षेत्रीय ताकतें

बेअसर हो चुकीं क्षेत्रीय ताकतें

2014 के चुनाव मे जनता नेताओं को राजनीति को मोल-भाव का कारोबार बनाने की जबरदस्त सजा दी। कांग्रेस ने 10 साल से जिस तरह नाप-तौल करके समय बिताया उसका पूरा हिसाब जनता ने उसे पचास के आंकड़े के नीचे लाकर दे दिया। कई सूरमाओ की जमानत तक जब्त हो गयी।

कांग्रेस के साथ-साथ इस बार के चुनाव में तीन राज्यो की क्षेत्रीय ताकत तमिलनाडू मे जयललिता, बंगाल मे ममता, उड़िसा मे नवीन पटनायक, तेलंगाना के टी.आर.राव की पार्टियों और अकाली दल को छोड़कर भाजपा के बाकी सहयोगी दलो के अलावा सभी का डब्बा गोल हो गया। सबसे ज्यादा जोर का झटका लगा देश की राजनीति में मुख्य किरदार निभाने वाले उत्तर प्रदेश की मायावती का, बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) को इस चुनाव मे जनता ने अंडा देकर दिखा दिया कि वो क्या कर सकती है। मायावती और मुलायम के सहारे ही यूपीए-2 अपना कार्यकाल पूरा कर पायी थी। और जनता ने कांग्रेस के पाप मे हिस्सेदारी के लिए बहनजी को लोकसभा से बाहर ही कर दिया।

कांग्रेस का साथ देने का गुस्सा जनता ने मुलायम पर खूब जाहिर किया। पिछले चुनाव मे 23 सीटों पर कब्जा जमाने वाली समाजवादी पार्टी इस बार सीधा 5 सीटों पर आकर गिरी। मुलायम के साथ ये हादसा राज्य मे दो साल पहले बम्पर बहूमत से आयी सरकार के हुआ। राज्य सरकार की नाकामी और कांग्रेस के लिए मुलायम की वफा के चलते जनता ने इस बार नेताजी को अपने साथ हुई बेवफाई का बदला ले लिया।

80 सीटों वाले यूपी मे 73 सीट जीतने वाली भाजपा को कांग्रेस, बसपा और सपा के त्रिकोणीय नजायज़ सम्बन्ध को भरपूर लाभ मिला। पड़ोस के राज्य बिहार मे भी भाजपा ने लाजवाब प्रदर्शन किया। इसी के साथ यहाँ के क्षेत्रीय दलों पर मोदी बम ऐसा गिरा कि बेवफाई का अंजाम मिला जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को, नीतिश की सारी सजाई फिल्डिंग खराब गयी और भाजपा का साथ छोड़ने का फायदा मिलने की जगह, मोदी लहर मे सारी इज्जत ही बह गयी। जदयू जब भाजपा के साथ हुआ करती थी तो उसे 20 सीट मिली थी लेकिन इस बार नीतिश ऐसे अकेले पड़े की 20 से एक जीरों हटकर 2 ही सीट हाथ आयी। विकास बाबू का तमगा लटका रह गया और इस बार जनता ने लूजर का अतिरिक्त मेडल नीतिश के गले मे डाल दिया।

सबसे ज्यादा मिट्टी खराब हुई लालू यादव की, एक तो पहले ही इतना चारा खा लिया कि सारी इज्जत की धज्जियाँ उड़ गयी। चारा घोटाले मे जेल गये चुनाव लड़ने पर रोक लग गयी, बेल पर दहाड़ते हुए बाहर आये पर चुनाव नतीजे आते ही लालू  की दहाड़ भिगी बिल्ली की म्याँउ मे बदल गयी। पिछली बार कांग्रेस का पल्लू झटककर अकेले चुनाव लड़कर करारी शिकस्त झेल चुके लालू इस बार कांग्रेस का हाथ थाम कर भी कोई कमाल नहीं कर पाये। पिछले चुनाव मे आरजेडी को मिली 4 सीट इस बार भी बरकरार रही बस फर्क इतना रहा कि सीटें बदल गयी। बिहार की राजनीति मे लेकिन रामविलास पासवान को भाजपा का ऐन मौके पर हाथ थामने का फायदा मिला। हाशिए पर जा चुकी लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को बिहार मे 5 सीटे मिली, जो कि भाजपा के बाद सबसे ज्यादा है।

यूपी बिहार जीतने के बाद भाजपा का दमनचक्र कई और राज्यों के दलो पर चलता गया। महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी 7 से 4 सीटों पर आ गयी, राज ठाकरे की मनसे अपना खाता भी नहीं खोल पायी, जम्मू कश्मीर मे सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस एक भी सीट नहीं जीत पायी, हरियाणा मे शिक्षक घोटाले मे फँसे ओमप्रकाश चौटाला की आईएनएलडी को महज दो सीट मिली, तमिलनाडू में जयललिता की आँधी के सामने करूणानिधी की दम्रुक (डीएमके)  बह गई, दम्रुक को एक भी सीट नहीं मिली, बंगाल में ममता के तूफान मे सीपीएम के साथ सारा लेफ्ट मात्र दो सीट जीत सका, झारखण्ड की सत्ताधारी झामूमो को भी 14 मे से मात्र दो सीट मिली, अजित सिंह की आरएलडी भी खाली हाथ रह गयी, हाल ही में दिल्ली मे अपना लोहा मनवा चुकी आम आदमी पार्टी को भी दिल्ली से कुछ नहीं मिला लेकिन पंजाब के लोगों ने केजरीवाल को चार सीटें देकर संतोषजनक शुरूआत दी। कुछ इस तरह एक दुक्का को छोड़कर कांग्रेस के साथ या फिर अकेले चुनाव लड़ने वालों को मोदी लहर ले उड़ी।

कांग्रेस के कई साल राज करने के बाद क्षेत्रीय दल ही थे जिनके कारण भारत को पहली बार 1977 मे गैर-कांग्रेसी सरकार मिली थी। लेकिन तभी से इन राजनीतिक दलों की मोल-भाव की राजनीति भी परवान चढ़ने लगी थी। चौधरी चरण सिंह ने 1979 मे सरकार गिराकर खूद कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गये जिसका अंजाम कांग्रेस के जल्द सरकार गिराने पर उन्हे मिल गया। इसके बाद 1989 मे फिर राजनीतिक दल एक साथ आये पर मोल-भाव की राजनीति ने सरकार का पिछा नहीं छोड़ा। यही चलन 1990 की चन्द्रशेखर की सरकार, 1996 में एच.डी. देवगौड़ा और 1997 मे आई के गुजराल के साथ भी हुआ। लेकिन 1998 मे भाजपा को सरकार बनाने की स्थति मे लाकर कांग्रेस के एकाधिकार को तोड़ने की कोशिश की। लेकिन फिर 1999 में जयललिता ने कांग्रेस से मोल-भाव करके सरकार गिरा दी। लेकिन जनता अपने स्टैंड पर कायम रही और 1999 मे फिर से भाजपा ने सरकार बनायी। एनडीए की ये सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाली पहली गैर-कांग्रेस की सरकार थी।

2014 मे भाजपा 1984 के बाद पूर्ण बहूमत के साथ सरकार में है, ओर जनता के साथ आँख मिचौली का खेल खेलने वाले क्षेत्रीय दलों को जनता ने इस बार करारा चांटा जड़ दिया है। सीबीआई, आयकर, भ्रष्टाचार से लेकर राज्य को विशेष पैकेज दिलाने के लिेए मोल-भाव करने वाले राजनीतिक दलों को जनता ने उनकी जगह अच्छे से दिखा दी है।

क्यों सिर्फ भाजपा क्षेत्रीय दल से राष्ट्रिय दल और अब अकेले बहूमत हासिल करने वाली पार्टी बन पायी ? क्यों सालो से अपने अपने क्षेत्र मे अपनी दुकान चलाने वाले राजनीतिक दल कभी बाहर पैर नही पसार पाये ? क्यों जनता को कांग्रेस का विकल्प मिलने मे देरी हो गयी ? क्यों भाजपा से अच्छा विकल्प जनता को नहीं मिल पाया ? इक्का दुक्का क्षेत्रीय ताकतों को छोड़कर एक बार सत्ता, और एमपी-एमएलए हाथ मे आने के बाद ये क्षेत्रीय दल पद और पैसे के नशे मे ऐसे मदहोश हो जाते है कि ना तो इनकी आइडियोलॉजी किसी काम की रहती है ना ही जनता से किेये वादे इन्हे याद आते है।

कुछ तो बात है कभी जनता का इतना प्यार पाने वाले ये क्षेत्रीय दल आज उसी जनता के गुस्से से घायल है, गलती तो है इनकी, लेकिन क्या करें सब करते है तो ये भी करते है। भाजपा अगर मोदी के नेतृत्व मे अच्छा काम कर गयी तो इन राजनीतिक दलों की दुकान पर अलीगढ़ का ताला पड़ जायेगा। या तो ये खूद सुधर जाये वरना तो जनता को पता है कैसे इन बागड़ बिल्लो की नकेल कसनी है।

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