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हिन्दुस्तान में अपना हक मांगने को मजबूर हिन्दी

ये लड़ाई है हिन्दी की

ये लड़ाई है हिन्दी की

आजकल एक बड़ी ही शर्मनाक स्थिति भारत के नागरिकों सामने आकर खड़ी हो गयी है। जिस हिन्दी को हमारे देश के नाम में शामिल किया गया है, आज उसी हिन्दी को शिक्षा के ऊपर से नीचे तक हर जगह से जैसे पेंसिल से लिखे शब्द  को रबड़ से मिटा दिया जाता है उसी तरह हमारे संविधान की गलत नीतियों ने हिन्दी को शिक्षा व्यवस्था से निकाल दिया है।

बड़े शहरों के स्कूलों मे हिन्दी को पढ़ने और पढ़ाने दोनो को शर्म का मुद्दा माना जाता है। शहरों के कई विद्यालय आज भी हिन्दी को महत्व देते है साथ मे गाँवों मे भी हिन्दी भाषा के साथ साथ बाकि विषयों को भी हिन्दी भाषा मे ही पढ़ाया जाता है। लेकिन समय के साथ हिन्दी अपने आप को बदल नहीं सकी और यही हिन्दी के पतन का सबसे बड़ा कारण है क्योंकि सरकार भले ही लाख कोशिश करले हिन्दी की जगह अंग्रेजी को बढ़ावा देने की लेकिन लोगों का ही हिन्दी से लगाव कम होता चला जाये फिर सरकार के हिन्दी को बढ़ावा देने की हर कोशिश की सफल होने की संभावना कम या फिर नामुमकिन  हो जाती है।

भारत मे अंग्रेजी की तरह हिन्दी के सुधार और प्रचार पर शोध पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, नये और जुबान पर आसानी से चढ़ने वाले जल्दी से याद हो जाने लायक शब्दों की खोज पर काम ना के बराबरक किया गया। जिसका परिणाम हमारे सामने है अंग्रेजी हमें आसान लगती है इसलिए हम हिन्दी को अपने पढ़ाई के विषयों मे शामिल नहीं करते है। कठिन शब्दो और बेहद जटिल व्याकरण के जाल मे हिन्दी ऐसी फँसी है कि जिसके वजह से छात्र हिन्दी से दूर भागते है। हिन्दी के साथ होता पक्षपात कुछ यूं भी सामने आता है कि स्कूलों मे अंग्रेजी विषय को 12वीं कक्षा तक अनिवार्य किया गया है जबकि हिन्दी आठवीं कक्षा के बाद वैकल्पिक हो जाती है। उच्च शिक्षा से तो हिन्दी पूरी तरह लगभग हाशिए पर जा चुकी है।

यूपीएससी की परिक्षा मे सी-सैट की परिक्षा पर मचे बवाल मे भी हिन्दी की अपने हक पाने की मशक्कत साफ दिखाई देती है। अंग्रेजी और हिन्दी का फासला इससे साफ दिख रहा है। सी-सैट का अंग्रेजी संस्करण अंग्रेजी भाषियों के लिए तो सरल है लेकिन हिन्दी संसकरण हिन्दी भाषियों के लिए बेहद कठीन बनाया जाता है। ऐसा क्यों होता है इसका तो पता नही, लेकिन हिन्दी भाषी छात्र की सफलता मे हिन्दी का ये जटिल रूप बड़ी बाधा बनता जा रहा है।

अंग्रेजी मे पेपर देने वालो की अपेक्षा हिन्दी मे पेपर देने वाले छात्रो के सलेक्ट होने के अनुपात मे आयी भारी गिरावट इस बवाल के पीछे सबसे बड़ा कारण है। हिन्दी से राजनीति और राजनेताओँ की बेरूखी तो हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा सभी मंत्रालयों और केन्द्रीय कर्मचारियों को हिन्दी मे काम करने को लेकर जारी किये गये आदेश के बाद मचे बवाल से साफ दिखाई देती है। दक्षिण के राज्यों खासकर तमिलनाडू के नेताओं को हिन्दी को मिलता कोई भी प्रोत्साहन फूटी आँख नहीं सुहाता। साथ में कई और राज्य जैसे जम्मू कश्मीर, बंगाल, ओड़ीसा और तमाम गैर- हिन्दी राज्य हिन्दी को मिलते बढ़ावे से बेचैन हो जाते है।

हिन्दुस्तान के अलावा हमारे दो और नाम है हिन्दी का नाम भारत और अंग्रेजी मे इंडिया। लेकिन हिन्दूस्तान से हमारे राष्ट्र की मुख्य भाषा, इसकी पहचान, हिन्दी का पता चलता है। हिन्दी पर अंग्रेजी को दी गयी सरकारी छूट ही है कि अंतराष्ट्रीय मंच पर ना तो हमारे देश को इसके प्राचीन नाम भारत ना ही देश पर सबसे ज्यादा समय राज करने वाले मुगलों द्वारा रखे गये नाम हिन्दूस्तान के नाम से बुलाया जाता है। हमारे देश को दुनिया भर इंडिया के नाम से जानते है ये नाम हमारे देश को अंग्रेजो ने दिया था। बहुत शर्म की बात है कि जो हम पर अत्याचार करके गये, हमारे देश को अपना गुलाम रखकर गये, आज उन्ही की गाली को हमने अपनी पहचान बना लिया है।

प्रधानमंत्री मोदी की हिन्दी उत्थान के लिये उत्सुकता हमारी राजभाषा, हमारी पहचान हिन्दी के लिए अच्छे संकेत है। यूपीएससी के छात्रों द्वार किया जा रहा आंदोलन भले ही सिर्फ सिविल सेवा के लिए होने वाली परीक्षा मे हिन्दी को उसका हक देने के लिए हो, लेकिन कहते है ना बूंद बूंद से सागर बनता है वैसे ही हिन्दी को उसका हक दिलाने के लिए हर एक आंदोलन जरूरी है।

शर्म की बात है कि हिन्दी को अपने ही देश मे हक के लिए लड़ना पड़ रहा है।

शर्म की बात है कि बाहर से आयी भाषा अंग्रेजी ने हमारे दिल से हिन्दी को बेदखले करके उसकी जगह ले ली है।

शर्म की बात है हिंदी बोलने वालो को आंदोलन के जरिए अपनी भाषा के हक के लिए अपने ही लोगों से लड़ना पड़ रहा है।

शर्म की बात है कि सिर्फ जरूरत पढ़ने पर ही हम हिंदी के बारे मे सोचते है।

शर्म की बात है कि हिन्दूस्तान मे हिन्दी के साथ ये सब हो रहा है।

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