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दंगो की राजधानी बनता उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश यानि दंगा प्रदेश

उत्तर प्रदेश यानि दंगा प्रदेश

जिस उत्तर प्रदेश को अखिलेश यादव की सरकार उत्तम प्रदेश बनाने के दावे कर रही थी वो दंगों की दुकान में तब्दील हो गया है। दंगा शहर-दर-शहर खुलेआम बिक रहा है और रोक लगाने वाला कोई नहीं। ताजा मामला शहर सहारनपुर का है जहां जमीन के एक टुकड़े को लेकर दो समुदायों में हुई भिड़ंत के बाद तीन लोगों की जान चली गई।

सहारनपुर शहर से लंबे समय बाद इस तरह के दंगे की खबर आई है। प्रशासन की दावा है कि अब हालात काबू में है। लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है कि अगर अदालत के आदेश के साथ खिलवाड़ हो रहा था तो पुलिस हाथ पर हाथ धरे क्यों देखती रही। आखिर एहतियाती कार्रवाई के लिए प्रशासन को किसके इशारे का इंतजार था।

सहारनपुर ने ऐसा नजारा दो दशक बाद देखा है। शहर की सड़कों पर गश्त लगाती पुलिस। फ्लैग मार्च करते सुरक्षा बलों के जवान। जलती दुकानों से उठता धुएं का गुबार। शहर की फिजा में घुला तनाव का जहर। घरों में कैद और खिड़कियों से झांकते शहरी।

शनिवार की सुबह जमीन के एक टुकड़े को लेकर विवाद बढ़ा। दो समुदाय आमने-सामने आ गए। शुरुआत ईंट-पत्थरों से हुई जो इतनी बढ़ी कि एक बार पुलिस को भी पांव पीछे खींचने पड़े। विवाद की जड़ जमीन का जो टुकड़ा है उसके बारे में एक समुदाय का दावा है कि उसने धार्मिक स्थल के निर्माण के लिए जमीन खरीदी थी। जबकि दूसरे समुदाय का दावा है कि उस जमीन पर कभी उनका धार्मिक स्थल हुआ करता था।

इस जमीन पर दोनों समुदायों के बीच लंबी मुकदमेबाजी चली। एक समुदाय को हाईकोर्ट में जीत हासिल हुई और उसने जमीन पर निर्माण कार्य शुरु कर दिया। निर्माण कार्य होता देख दूसरे समुदाय के लोग भी जुट गए और उन्होंने निर्माण रोकने की कोशिश की। ये कोशिश पहले जुबानी विवाद और फिर खूनी हिंसा में तब्दील हो गई। आरोप है कि विवाद बढ़ता ही नहीं अगर एक पार्षद ने इस मामले में एक समुदाय विशेष को उकसाया न होता। प्रशासन भी मान रहा है कि सबकुछ नियोजित ढंग से हुआ।

हालात इतनी तेजी से बिगड़े की यकायक पुलिस के लिए भी संभलना मुश्किल था। शहर के अंबाला रोड पर एक साथ एक पूरे कटरे में आग लगा दी गई जिसमें डेढ़ दर्जन से ज्यादा दुकानें थीं। उपद्रवियों ने फायर ब्रिगेड का दफ्तर तक फूंक दिया। हालात को काबू में करने के लिए पुलिस को कई राउंड गोलियां चलानी पड़ीं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सहारनपुर से लखनऊ तक तार खड़खड़ाए। कमिश्नर, डीआईजी समेत कई आला अधिकारी मौके पर पहुंचे। रैपिड एक्शन फोर्स की एक बटालियन और पीएसी की एक टुकड़ी को हालात संभालने के लिए तैनात कर दिया गया। छोटी-छोटी तंग गलियों वाले शहर सहारनपुर में पहली बार पुलिस ने ड्रोन के जरिए निगरानी एक नया प्रयोग किया। इस तकनीक का इस्तेमाल अब तक नक्सल प्रभावित इलाके में ही होता रहा है।

बहरहाल एक तरफ हालात बेकाबू थे तो दूसरी ओर सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी था। बीजेपी ने इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। तो राज्य सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि ये दंगे बीजेपी ही भड़का रही है। जबकि वामपंथी दलों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार दंगाइयों को कुचलने में नाकाम साबित हो रही है।

बहरहाल दो दिन के कर्फ्यू के बाद हालात सामान्य देख सोमवार को प्रशासन ने कर्फ्यू में ढील दी। शहर के नए और पुराने दोनों हिस्सों में अलग-अलग वक्त पर कर्फ्यू में छूट दी गई। जरूरी सामानों की खरीद के लिए लोगों की भीड़ सड़कों पर उमड़ आई।

जाहिर है हालात यूं ही सामान्य रहे तो कर्फ्यू में छूट की समय-सीमा बढ़ेगी। लेकिन लोगों के दिलों-दिमाग में दहशत और तनाव अब भी बना हुआ है। उनके लिए अब भी ये समझना मुश्किल है कि आखिर ये सब अचानक कैसे हो गया। जिस शहर ने 22 साल पहले सांप्रदायिक तनाव और हिंसा से तौबा कर ली थी उसे किसकी नजर लग गई। जिस मामले में लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा था उसमें अदालत के फैसले के बाद पुलिस प्रशासन ने निर्माण कार्य से पहले जरूरी एहतियात क्यों नहीं बरता।

written and published by http://www.khabar.ibnlive.in.com/

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