सामग्री पर जाएं
Advertisements

नारी पर भारी सामाजिक नियम

देश में चर्चा का विषय रहा तीन तलाक का मामला लगभग खत्म हो चुका है। तीन तलाक गैर कानूनी हो गया है और काूनन बनाकर सजा का भी प्रावधान लाया जा रहा है। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों मिलने का ये बहुत ही ऐतिहासिक काम सुप्रीम कोर्ट ने किया और कानून लाकर सरकार कर रही है।

मुस्लिम महिलाओं के लिए अभी भी कई बंधन है बुर्का प्रथा भी उसी में से एक है। जब तक कोई महिला अपनी मर्जी से बुर्का पहन कर चलना चाहती है तब तक सही है लेकिन तब क्या जब कोई मुस्लिम बच्ची और लड़की जीन्स पहनना चाहती हो। शार्ट स्कर्ट तो खैर नहीं पहनी जाए क्योंकि अंग का प्रदर्शन करके महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ना सही नहीं है। लेकिन फिर भी कोई साड़ी पहने, सूट पहने, लांचा पहने, हाफ स्कर्ट पहने तो उस पर जबरन बुर्का थोपना कहां तक ठीक है।

धर्म कोई भी हो पचड़े एक जैसे है सभी धर्मों में लड़की शादी के बाद पति के घर जाती है। लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो सकता है जब किसी की अकेली लड़की हो तो लड़का लड़की के परिवार के साथ ही रहे या फिर देखभाल का जिम्मा उठाए। पति पत्नी दोनो ही अपने अपने परिवार को ख्याल रखें।

हिंदू धर्म में भी कम कायदे कानून नहीं है। जन्म से ही लड़की को देवी की तरह पूजने की जगह ये इल्म मनाया जाता है कि बेटा हो जाता तो ठीक रहता या फिर एक और बेटा हो जाता तो ठीक रहता। बेटा बेटी वाला हाल तो सभी धर्मों मे कॉमन ही मानो। परिवार को आगे बढ़ाने के लिए बेटे की जरूरत पड़ती है। लेकिन बेटे की चाहत में बेटी को उसका हक ना देना कौन सा न्याय है। बेटी दुनिया में आयेगी तो ही कोई बेटा आएगा। वर्ना तो दुनिया वहीं खत्म हो जाएगी।

दूसरा बेटी की शादी हो तो दान के तौर पर दिया जाना वाला दहेज एक कुप्रथा बन गया है। बेटी को गिफ्ट देना गलत नहीं है लेकिन किसी लड़के वाले को अपना कर्जा वापस लेने की तरह पैसे मांगना कहां तक सही है। एक बाप जीवनभर अपनी बेटी को पालता है इस आस में कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर अच्छे घर जाए। लेकिन तब क्या जब बेटी को पढ़ाने लिखाने के बाद भी पढ़ी लिखी गंवार दुनिया उसकी बेटी को अपनाने की कीमत मांगे ?

हमारा समाज कुरीतियों से घिरा हुआ है और हम से ही कुरीतियों की शुरूआत होती है और हम से तीन तलाक जैसी कुरीति गैर कानूनी अपराध बन जाती है। हम में से किसी ने दहेज को दान की तरह शुरू किया और  फिर किसी ने उसे अपना हक मान लिया और समाज ने भी उसे अनिवार्य घोषित कर दिया और फिर एक दिन किसी ने दहेज को गलत बताते हुए उसे गैरकानूनी अपराध बता दिया। दहेज मांगने पर जेल हो जाती है अब तो।

इन सब के बीच भी समाज का ताना बाना कुछ ऐसा ही कि आप मन मारकर इसी के बीच रहने को मजबूर है क्योंकि इसके बिना आप जिंदा लाश हैं। अपने घरवालों से ज्यादा आप किसी पर यकिन नहीं कर सकते, व्यक्ति किसी पर अंधा विश्वास कर ले तो घरवाले भी विश्वासघाती बन जाते है।

महिलाओें के अधिकारों की जहां तक बात है तो कायदे कानून ऐसे है कि महिलाओं को अधिकार मिलना सिर्फ न्यायालय के बस की बात है। दहेज के बाद जब लड़की के घर बेटा होता है तो फिर उसके घर पर छोछक (ये शब्द बृज भाषा है ये बेटी के घर बच्चा पैदा होने पर दिया जाने वाला दान होता है) लेकर जाना पड़ता है और तो और जब लड़की के बेटे या बेटी की शादी हो तो लड़की के घरवालों की तरफ से भात (लड़की के पिता और भाई जो भी जिंदा होता है वो इस रस्म को निभाता है) भी जाता है। यानि सिर्फ लड़कियों के लिए ऐसा क्यों है ?

अब बताइए जो लड़की गहने भी अपने मायके के पहनती है उसे हक देने के लिए आप हमारे समाज से कह रहे है। वो समाज जिसमें दहेज मांगने वाले ससुराल वाले भी है। तीन तलाक दे देने वाले पति भी है और महिलाओं को चुप करा देने वाले उसी के अपने घरवाले यानि माता पिता भाई भी है।

रेप को अपराध माना जाता है क्योंकि ये महिलाओं के साथ होता है और इसलिए होता है क्योंकि लड़का और लड़की को सेक्स करने की इजाजत नहीं होती है। लेकिन रेप के बाद बदनाम जैसे शब्द का इस्तेमाल होता है वो भी सिर्फ लड़की के लिए ही, लड़का बदनाम नहीं होता है लड़का तो जवान होता है। थू है ऐसे समाज पर जो ये सब होने दे रहा है। रेप जैसा शब्द सिर्फ महिलाओं के लिए क्यों बनाया गया है ये भी तो समाज की ही देन है।

लडकी अपनी मर्जी से सेक्स करे तो वो चरित्रहीन हो जाती है और लड़का करे तो लड़का जवानी के मज ले रहा है। सेक्स वर्कर सिर्फ महिलाएं होती है क्योंकि लड़के ही तो सेक्स करने के मजे लेते हैं लड़कियों के लिए तो ये एक ड्यूटी होती है या सिर्फ पैसा कमाने का जरिया भर होता है।

कभी कभार तो लगता है कितना गंदा है इस गृह का समाज। देश बदलते है, मजहब बदलते हैं लेकिन मानसिकता वही रहती है लड़की के साथ सेक्स को मर्दानगी का सर्टिफिकेट माना जाता है। अरे यार एक लड़की की इज्जत बचाने वाला होता है मर्द। एक लड़की को बिना दहेज अपना लेने वाला होता है मर्द। लड़की के घर वालों से चवन्नी भी नहीं मांगने वाला होता है मर्द। लड़की का दिल जीतकर उसके शरीर को जीतने वाला होता है मर्द।

खैर ये समाज बदलने से रहा। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा बंद करवाई, विधवाओं को भी फिर से बड़ी मुश्किल से दुबारा शादी का हक मिला  लेकिन समाज की नीयत यू की यू ही रही है। विधवा को विधवा कहना कहां तक सही है ? वो महिला नहीं है क्या ? दहेज गैरकानून है फिर धडल्ले से चल रहा है। बाल विवाह गलत है फिर भी चल रहा है। तीन तलाक गलत है फिर भी चल रहा है।

और हां रेप गलत है वो भी तो हो ही रहे हैं रोज। कौन बदलेगा समाज को, कानून या फिर समाज के लोग खुद ? अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कोर्ट में जाकर तीन तलाक के खिलाफ लड़ रही महिलाओं के खिलाफ खड़ा होने के बजाए उनके लिए अपना वकील दे देता तो लगता समाज बदलना चाहता है। समाज के ठेकेदार ही इसके सबसे बड़े दुश्मन है।

महिलाओं के लिए जितनी बेड़ियां इस समाज में उसमें राम जैसे पति हर महिला को नहीं मिलते। जनक जैसे पिता भी सबको नहीं मिलते है। कृष्ण भगवान जैसा सखा भी हर किसी को नहीं मिलेगा।

लड़कियों की भ्रूण हत्या पर बने धारावाहिक ‘ना इस देश मेरी लाडो’ का ये गाना सटीक बैठता है

जय हिंद.. लड़कियों को देवी की तरह पूजो.. उनकी इज्जत करो बस..

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: