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बजट का रोना रोने वालों को पीएम ने दिया विकास का फॉर्मूला

प्रधानमंत्री मोदी जिनके किए काम अगर गिनाए जाए तो जमीनी काम में जीएसटी और नोटबंदी के अलावा कुछ जनता को ना तो दिखाई दिया है और ना ही सुनाई दिया है। रूपया जैसे कि गिरता ही जा रहा है और शेयर बाजार का कोई पता नहीं कब खुशी दे दे और कब कितने निवेशकों को बर्बाद कर दे।

लेकिन पीएम को विश्वास है कि विकास हो सकता है। दिल्ली में संसद भवन में आयोजित हुए राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि देश में कई संसाधन है अधिकारी है लेकिन विकास क्यों नहीं हो पा रहा है। पीएम ने कहा देश के कई जिले अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं तो क्यों ऐसा कि कई जिले ऐसे हैं जहां पर विकास का काम बढ़ ही नहीं पा रहा है।

पीएम मोदी ने कहा कि ये सोच बना ली गई है कि कुछ जिले पिछड़े हुए है लेकिन उनके मुताबिक पिछड़ा शब्द ही गलत है। पीएम के मुताबिक हमें बैकवर्ड नहीं फॉरवर्ड सोच रखनी चाहिए। पीएम ने कहा कि इन जिलों में युवा डीएम की तैनाती की जगह सीनियर आईएएस अधिकारियों की पोस्टिंग की जाती है जिस वजह से सही टैलेंट का इस्तेमाल नहीं हो पाता है। डीएम की पोस्टिंग में 40 से ज्यादा उम्र के अधिकारियों की पोस्टिंग विकास की रेस से बाहर जिलों में की जाती है जिसकी वजह से युवा और जोश से भरे आईएएस अधिकारियों को उन जिलों में काम करने का मौका नहीं मिल रहा है जो उन जिलों की तस्वीर बदल सकते हैं।

प्रधानमंत्री की बात में साफ था कि कई हजार करोड़ रूपये वेतन पर सरकार खर्च करके रिजल्ट लाने की कोशिश में है। पीएम ने हालांकि जनप्रतिनिधियों की भागीदारी पर भी जोर दिया कि हर जनप्रतिनिधि जो अपने क्षेत्र की जनता का चुना हुआ नेता है उसको भी अधिकारियों के जरिए विकास का काम करवाने की जद्दोजहद में लगे रहना चाहिए। पीएम ने कहा कि जनता के प्रतिनिधियों को अपनी सोच बदलनी होगी। पीएम के मुताबिक अगर लोकल स्तर पर गांवों में ग्राम प्रधान और शहरों में नगर निगमों के पार्षद, ब्लॉक प्रमुख से लेकर नगर पंचायत सदस्य फिर उसके ऊपर विधायक और उसके ऊपर सांसद अगर साथ मिलकर क्षेत्र का विकास करें तो शायद हर जिला विकसित होगा।

पीएम की बातों पर अगर गौर करें तो साफ संदेश है कि देश में अनगिनत संस्थाएं हैं जिनका काम है जनता की सेवा करना। लेकिन ना तो जनता के नौकर यानि की पब्लिक सर्वेंट कर्मचारी और अधिकारी सब जगह सही काम कर रहे हैं ना ही जनता के चुने हुए नौकर यानि की जनप्रतिनिधि सही काम कर रहे हैं। इतनी संस्थाओं में समन्वय ना होने की वजह से विकास बंटा हुआ है विवादों में फंसा हुआ, फंड का जाल तो बहुत लंबा है कौन कहां पैसा गायब कर रहा है कौन उस पैसे का इस्तेमाल सच में विकास के लिए कर रहा है कोई कुछ नहीं कह सकता है।

गांव में ग्राम पंचायत, ग्राम सभा से ये कारवां शुरू होता है फिर शहरों में नगर पंचायत, नगर निगम, विकास प्राधिकरण होते हैं इन सभी में कई करोड़ कर्मचारी काम कर रहें हैं और कई लाख चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं। राज्य स्तर पर पब्लिक वर्क डिपार्टमेंट, राज्य की सरकार, राज्य के अधिकारी और कर्मचारी भी लाखों में होते हैं जो सिर्फ जनता के काम कराने के पैसे पाते हैं लेकिन जनता को अपना काम निकलवाने के लिए बहुत मेहनत करनी ही पड़ती है। केंद्र का भी यही हाल है सांसद, अधिकारी, कर्मचारी और फिर खुद प्रधानमत्री, संसद ये सब देश चलाने के लिए हैं और देश का विकास करने के लिए हैं लेकिन होता क्या है कुछ नहीं।

लेकिन बड़ा सवाल ये भी है कि इन सभी स्तर पर भ्रष्टाचार भी बहुत है। लोकपाल बिल जो इस तरह की सभी शिकायतों और अधिकारी की अक्ल ठिकाने के लिए लाया गया उनके बाद लोकपाल की नियुक्ति अटकी हुई है किसी राज्य में लोकायुक्त है तो कई राज्य में है ही नहीं। हर विभाग का अपना शिकायत विभाग है लेकिन उस विभाग के अधिकारियों और मंत्रियों के सामने शिकायत विभाग की क्या औकात है तो भई शिकायत रखी रह जाती हैं। सीवीसी है तो लेकिन अधिकार कुछ नहीं है भ्रष्टाचार की शिकायतें आती हैं कार्रवाई की सिफारिशें होती हैं लेकिन होता क्या है कुछ नहीं।

तो पहले प्रधानमंत्री जी भ्रष्टाचार खत्म करें, सिटिजन चार्टर भी लागू हो ताकि अधिकारी तय समय पर काम करके जनता को दें। ग्राम प्रधान से लेकर सांसदों की जिम्मेदारी भी तय हो। फंड कहां खर्च हो रहे हैं उसकी जांच की जाए। एक पारदर्शी व्यवस्था हो जैसे ऑनलाइन बैंक खाते में बैंक स्टेटमेंट होता है वैसे ही हर फंड का भी स्टेटमेंट होना चाहिए तब जाकर कुछ होगा।

लेकिन 4 साल से लोकपाल की नियुक्ति अटकी हुुई है। अब हो भी गई तो क्यो होगा इतने सुधारों के बाद लोकपाल निष्पक्ष होगा ये तो खुद ही संदेह का मामला है। हालांकि प्रधानमंत्री की बाते काफी प्रभावित करने वाली थी।

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