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भारत की गोल्डन बेटियां मीराबाई और संजीता चानू- जानिए हौसलों की उड़ान की कहानी

ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में कॉमनवेल्थ खेलों में भारत का नाम रौशन करने वाली मणिपुर की दो बेटियों की कहानी संघर्ष से भरी है।
कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले दिन भारत के लिए वेट लिफ्टर सिखोम मीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता। तो दूसरे दिन वेटलिफ्टिंग में मणिपुर की ही खुमुक्चम संजीता चानू ने 53 किलोग्राम कैटेगरी में गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

दोनों के नाम को देखकर लगता है कि दोनों बहनें हो सकती हैं लेकिन ऐसा नहीं है। चानू का इस्तेमाल मणिपुर में कुंवारी लड़कियों के लिए किया जाता है। वैसे दोनों की आइडल मणिपुर की महिला वेटलिफ्टर कुंजुरानी हैं। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में दोनों 48 किलोग्राम वर्ग में थी संजीता ने गोल्ड और मीराबाई ने सिल्वर मेडल भी जीता था। और हां दोनों में एक और बात कॉमन है उनकी नौकरी। फिलहाल संजीता और मीराबाई दोनों ही रेलवे में नौकरी कर रही हैं वो भी नॉर्थ फ्रंटियर रेलवे में। हालांकि दोनों के परिवार ने उनके के लिए राज्य में ही अच्छी नौकरी की मांग की है। रेल मंत्रालय ने एक ट्वीट के जरिए दोनों को शुभकामनाएं दी।

मीराबाई चानू की कहानी-

पदक जीतने के बाद मीराबाई चानू (फोटो- PMO ट्वीटर)

देश को कॉमनवेल्थ गेम्स में पहला गोल्ड जिताने वाली सिखोम मीराबाई चानू 48 किलोग्राम वर्ग में मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन भी हैं। पिछले साल अमेरिका में हुई वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था। 2014 ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किलोग्राम वर्ग का सिल्वर मेडल उन्होंने अपने नाम किया था।

हालांकि 2016 में रियो ओलंपिक में उनका प्रदर्शन सही नहीं रहा और मेडल नहीं जीत पाने के बाद वो काफी निराशा में चली गई थीं। लेकिन एक साल बाद ही वर्ल्ड चैंपियन बनकर उन्होंने निराशा पर जीत हासिल की। और इसी साल 2018 का पद्म श्री पुरस्कार भी उन्हें दिया गया है।

अमेरिका में मीराबाई चानू के वर्ल्ड चैंपियन बनने के दौरान की तस्वीर (फोटो-टवीटर)

मीराबाई का जन्म 8 अगस्त 1994 को मणिपुर के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका गांव राजधानी इम्फाल से करीब 200 किलोमीटर दूर था। छह भाई बहनों में सबसे छोटी मीराबाई है।

उनके बड़े भाई और सेना के जवान सांतोम्बा का बयान वायरल हो रखा है। वो कहते हैं ‘एक दिन मैं लकड़ी का गठ्ठर नहीं उठा पाया, लेकिन मीरा ने उसे आसानी से उठा लिया और वह उसे लगभग 2 किमी दूर हमारे घर तक ले आई। तब वह 12 साल की थी।’

नवभारत टाइम्स वेबसाइट के मुताबिक चानू ने जब वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग शुरू की थी, तब उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। इस वजह से उन्हें कई बार अच्छी डाइट नहीं मिल पाती थी। – उनके कोच ने उन्हें डाइट चार्ट देते हुए चिकन और दूध ज्यादा से ज्यादा लेने के लिए कहा था। लेकिन उस वक्त उनके परिवार के लिए उन्हें ये दे पाना संभव नहीं था। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने प्रैक्टिस को जारी रखा।

मीरा ने साल 2007 में जब प्रैक्टिस शुरू की तो उनके पास वजन उठाने के लिए लोहे की रॉड नहीं थी, जिसके बाद उन्होंने बांस से ही प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया। – ट्रेनिंग के लिए वे रोजाना 50-60 किलोमीटर दूर जाया करती थीं। इसके बाद 11 साल की उम्र में वे अंडर-15 चैम्पियन बनीं और 17 साल में जूनियर चैम्पियन। चानू ने 31 अगस्त, 2015 में रेलवे ज्वाइन की। वे वहां सीनियर टिकट कलेक्टर के पद पर हैं।

उनके कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने पर उनके गांव में जश्न भी मनाया गया।

संजीता चानू की कहानी-

गोल्ड कोस्ट में पदक जीतने के बाद संजीता चानू (फोटो-ट्वीटर)

संजीता चानू भी मणिपुर से ताल्लुक रखती हैं 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था।

कई मेडल जीत चुकी संजीता 2017 में उस समय भी खबरों में आई थीं जब अर्जुन पुरस्कार पाने वालों की लिस्ट में उनका नाम नहीं था. इसके बाद उन्होंने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। संजीता को अर्जुन अवॉर्ड तो नहीं मिला लेकिन उन्होंने इसका जवाब उन्होंने गोल्ड कोस्ट में गोल्ड मेडल जीतकर दिया। अब उन्हें उम्मीद है कि उन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिल जाएगा।
संजीता पहली बार तब सुर्खियों में आईं, जब 2011 एशियन वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता। 2012 में उन्होंने कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड जीता।

24 साल की संजीता मणिपुर के ककचिंग जिले के एक गांव से आती हैं। 2006 में संजीता ने वेटलिफ्टिंग शुरू की थी। परिवार में कुल पांच भाई बहन थे और गरीबी की वजह से उनका सफर संघर्ष से भरा था। पिता का सपोर्ट उनको प्रेरणा देता रहा और पहले जूनियर और फिर सीनियर लेवल पर खेलकर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट तक का सफर तय किया।

टाइम्स ऑफ इंडिया वेबसाइट के आर्टिकल में उनके पिता कहते हैं एक बार वो पूरी तरिके से निराश हो गई थी और उन्होंने पिता से खेल छोड़ देने की बात कही। लेकिन उनके पिता ने उन्हें मेहनत करते रहने को कहा। जिसके बाद संजीता आगे बढ़ती गई।

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संजीता और मीराबाई चानू को दिए जा रहे इनाम पर भी विवाद शुरू हो गया है। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने दोनों को 15-15 लाख रुपये देने की घोषोणा कर की है। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल के लिए बहुत कम राशि बताया है। हालांकि मणिपुर सरकार के मुताबिक सभी पदक विजेताओं के लिए इनाम राशि पहले से तय की जा चुकी थी।

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