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श्रम दिवस स्पेशल: क्या सिर्फ गरीब श्रमिकों का दोहन होता है – पढ़े लिखे नौकरीपेशा श्रमिकों की क्या है हालत ?

दुनिया में हर कोई जो श्रम कर रहा है, मेहनत कर रहा है, काम कर रहा है वो श्रमिक है। लेकिन गरीब श्रमिकों की हालत सबसे खराब होती है। श्रम कानून का कड़ा होना और उद्योगों, सरकारों, लोगों का उसे लागू करना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

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दुनियाभर में कई देश हैं जहां पर हर श्रमिक खुश है लेकिन हर देश में हर श्रमिक को खुशियां नहीं मिलती हैं। विकसित देशों में श्रमिक ज्यादा खुश होते हैं, न्यूनतम वेतन भी ठीक ठाक होता है। लेकिन जैसे ही बात भारत जैेसे विकासशील देश की आती है तो लचीले श्रम कानून या बेरूखे श्रम कानून जो सिर्फ कागज़ पर कल्याणकारी होते हैं। ना सरकार को, ना नेताओं को, सरकारी नौकरों को जनता के श्रम अधिकारों की चिन्ता होती है।

हालांकि ये कहना सही नहीं है कि भारत में केंद्र सरकरों ने श्रम सुधारों के क्षेत्र में काम नहीं किया लेकिन इच्छाशक्ति कमी रही है। कई सरकारों ने क्रांतिकारी बदलाव किए लेकिन कानून खुद ही पहेली होते हैं या फिर वो क्रियान्वयन में फेल साबित होते हैं।

आपको बता दें कि भारत सरकार की ओर से कभी भी कोई एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन जारी नहीं होता है। सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि कुछ मीडिया रिपोर्टस में दावा किया गया कि सरकार 18000 रूपये मासिक वेतन को न्यूनतम वेतन करने जा रही है प्रेस रिलीज़ में कहा गया कि ये दावा गलत है और अलग अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग न्यूनतम वेतन तय किया जाता है। मौजूदा समय में 15000 रूपये मासिक वेतन को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन बताया जाता है हालांकि सरकार की ओर से कभी ऐसा नहीं कहा गया है।

 

दिहाड़ी मजदूर से लेकर मल्टी नैशनल कंपनी में काम करने वाला इंप्योई, सभी लोगों को फायदा होगा अगर श्रम कानून अच्छे होते हैं।

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आइए एक नज़र डालते हैं कि अभी क्या स्थिति है।

  • भारत में काफी सस्ते श्रमिक मिल जाते हैं, दुनिया की दुसरी सबसे बड़ी जनसंख्या होने की वजह से यहां पर काम करने वाले लोग ज्यादा हैं जबकि काम देने वाले कम हैं और नौकरियां भी सीमित हैं।
  • दुनिया में सबसे सस्ते वाले श्रमिक वाला देश है युगांडा। भारत हालांकि इस सूची में काफी पीछे है लेकिन फिर भी यहां पर दुनिया का सबसे सस्ता श्रमिक नहीं मिलता है।
  • एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया का सबसे सस्ते जीवनयापन वाला देश है। लेकिन फिर भी कई क्षेत्रों में महंगाई बड़ी वजह है जो कई लोगों के लिए उनके श्रम में मिले वेतन के हिसाब में नहीं बैठ पाते हैं।
  • भारत दुनिया की बड़ी कंपनियों के आउटसोर्सिंग में काफी बड़ा योगदान देता है। बीपीओ के क्षेत्र में भारत दुनिया में सबसे बड़ा देश है यानि नंबर 1। वजह है यहां पर सस्ते श्रमिक मिलना, जो पढ़े-लिखे भी होते हैं और कंप्यूटर-फोन कॉलिंग जैसे कामों का भी भी कौशल रखते हैं।
  • भारत में बड़ी कंपनियों में श्रमिकों की स्थिति थोड़ी सही है, जैसे टाटा ग्रुप, रियायंस इंडस्ट्रिज़ जैसे बड़े उद्योगपतियों के स्वामित्व वाले उद्योग श्रमिकों को उचित वेतन देते हैं।
  • जहां बात मीडियम या छोटे ग्रुप वाले उद्योगपतियों पर आती है तो कई के तो नाम बड़े होते हैं लेकिन दर्शन छोटे मिलते हैं। कई नामी कंपनियों में शुरूआती सैलरी आपको बहुत कम मिलेगा जबकि कंपनी काफी प्रसिद्ध होती हैं।
  • एक या दो फैक्टरी के मालिक (सभी छोटे-स्तर के उद्योगपति) अपने मुताबिक सबसे सस्ता वेतन अपने श्रमिकों को देते हैं। यहां पर शुरूआती वेतन इतना कम होता है कि यहां काम करने वालों को श्रमिक की जगह मजदुर कहा जाता है। हालांकि सबसे ज्यादा जनसंख्या ऐसे ही उद्योगों पर निर्भर है। ऐसा इसलिए कि बड़ी और मीडियम स्तर की कंपनी हर शहर में नहीं होती है ये राज्यों के बड़े उद्योग हब शहरों में मिलेंगे लेकिन देश के हर शहर में निम्न स्तर के उद्योग जरूर मिल जाएंगे। यहां पर कर्मचारी भविष्य निधि आयोग (EPFO) के दायरे में आने वाले लोग भी कम ही मिलेंगे क्योंकि कंपनी ही ईपीएफओ का हिस्सा नहीं होती हैं।

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  • कंस्ट्रक्शन से जु़ड़े उद्योगों में श्रमिकों की स्थिति सबसे खराब है यहां पर काम करने वाले मजदूर के नाम से जाने जाते हैं और यहां दिहाड़ी पर भी काम किया जाता है। बड़ी-बड़ी कंपनियां भी ठेके पर मजदूरों को तय समय के लिए काम पर लेती हैं और फिर काम खत्म होने के बाद उनको छोड़ देती हैं। कई शहरों में लेबर चौक नाम से जगह होती हैं जहां पर सस्ते कंस्ट्रक्शन मिस्त्री से लेकर साथी मजदूर मिल जाएंगे। यहां भी ईपीएफओ का फायदा लोगों तक नहीं पहुंच पाता है।

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  • निम्न स्तर के बाद गली-कूचों, मॉल, बाजारों में दुकानों में काम करने वाले श्रमिक भी आते हैं। यहां भी श्रमिकों को मिलने वाला वेतन बहुत कम होता है। इस क्षेत्र में भी श्रमिकों की बड़ी संख्या है जो इस वक्त श्रम कानूनों की बेरूखी का शिकार हैं और अपने दुकान मालिकों की मनमानी झेल रहे हैं।
  • प्राइवेट के अलावा सरकारी क्षेत्र में भी श्रमिक हैं। हालांकि सरकारी श्रमिकों की हालत काफी बेहतर है लेकिन सिर्फ उनकी जो पक्के हैं यानि जिन्हें सरकार पैसे देती है। लेकिन यहां भी बड़ी मात्रा में आउटसोर्सिंग होती है और ठेके पर लोगों को रखा जाता है जिसका भुगता ठेकेदारों को किया जाता है यहां से फिर भी लोगों को वेतन मिलता है। सरकारी कंपनियां में ये काम ज्यादा होता है कई ऐसी सार्विजनिक क्षेत्र की कंपनी है यहां पर ग्रेड सी और डी पर भर्ती कई सालों से हुई ही नहीं है और ठेके पर लोगों को रखकर काम चलाया जा रहा है।

मतलब कई उद्योगपति खुद से अपनी कंपनी में काम कर रहे लोगों का ख्याल रखते हैं लेकिन कई उद्योगपति ऐसा नहीं करते हैं। सरकार से जुड़े कार्यालयों में भी आउटसोर्सिंग हो रही है जहां ठेके पर रखे गए लोगों से काम चलाया जा रहा है। मध्यम और निम्न स्तर के उद्योगों में भी यही हाल है जहां पर कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले लोग ज्यादा हैं और पक्के लोग कम हैं।

अब बात सरकार क्या कर सकती है।

  1. श्रम कानून को कड़ा किया जाए और उद्योगों पर सख्ती दिखाए जाए। सभी कंपनियों को जीवन-यापन योग्य और महंगाई के हिसाब से शुरूआती वेतन दिए जाने को कहा जाए और तभी उन्हें लाइसेंस दिया जाए और आदेश नहीं मानने पर कंपनी का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया जाए और नियम के पालन करने पर ही मान्यता बहाल की जाए।
  2. लेबर यूनियन में राजनीति होती है जिसकी वजह से श्रमिकों की बात सरकार तक नहीं पहुंच पाती है। प्राइवेट नौकरियों में तो यूनियन भी नहीं होती हैं। सरकार को एक पोर्टल बनाना चाहिए जिसमें देश के सभी श्रमिकों का अकाउंट हो और उनकी बातों को बहुमत से सुना जाए।
  3. निम्न स्तर के उद्योगों में श्रमिकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए कुछ ठोस मैकेनिज्म तैयार किया जाए। ताकि रोजगार सुरक्षित हो सके और वेतन भी सही मिले।
  4. ठेकेदारी प्रथा और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले लोगों के लिए कुछ ठोस योजना लाइ जाए जिसमें एक जगह से काम छूटने के बाद दूसरी जगह काम मिलने तक के बीच में सरकार उनकी मदद करे या फिर नई नौकरी ढूंढने में मदद करे।
  5. दूकानों, शोरूम, मॉल में काम कर रहे लोगों के लिए भी उचित मैकेनिज़्म तैयार किया जाए।
  6. सरकार को खुद एक जॉब पोर्टल शुरू करना चाहिए जिसमेें सरकारी नौकरियों के साथ प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों की भी जानकारी हो, इससे जॉब पोर्टल के जरिए होने वाली धोखाधड़ी से भी लोग बच सकेंगे और उन्हें सरकार से वेरीफाइड नौकरी भी मिल पाएगी।

भारत सरकार ने 2017 में एक वेतन कोड बिल पेश किया था जिसको इस साल मॉनसून सत्र में लोकसभा में रखा जाएगा। सरकार के मुताबिक वेतन जु़ड़े कई कानून को एक करके लाया जा रहा है। देश के श्रम मामलों के मंत्री संतोष गंगवार के मुताबिक सरकार सबसे अधिक न्यूनतम वेतन तय करने जा रही है जिसके नीचे राज्य सरकारें वेतन तय नहीं कर पाएंगी।

कानून अगर पास होता है तो देश के सभी श्रमिकों को इसका फायदा होगा लेकिन कानून का लागू होना भी जरूरी है।

 

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