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कुमारस्वामी शपथ ग्रहण: बेगानी शादी में विपक्ष दीवाना – 2019 में बनेगी गठबंधन सरकार?

कर्नाटक में जेडी(एस) के एच डी कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो बीजेपी के सभी विरोधी दल के नेता एक मंच पर दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था जैसे आगामी 2019 चुनाव के लिए सभी एक साथ बीेजेपी को हराने की शपथ ले रहे हैं।

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शपथ ग्रहण में यूपीए गठबंधन की चेयरपर्सन सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, क्षेत्रीय दलों के नेता समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती, सीपीएम महासचिव सीताराम येचूरी, सीपीआई राष्ट्रीय सचिव डी राजा, राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजीत सिंह चौधरी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) अध्यक्ष शिबू सुरेन जैसे दिग्गज शरीक हुए।

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कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी इस विपक्षी एकता की नुमाइश में शामिल हुए। पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी, आन्ध्र प्रदेश से चंद्रबाबु नायडू, केरल के पी. विजयन, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल और पुद्दुचेरी से वी नारायणसामी भी एकता की शपथ लेने पहुंचे।

विपक्ष की एकजुटता के बीच जम्मू-कश्मीर से उमर अब्दुल्ला या उनके पिता फारुक अब्दुल्ला, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक या कोई बीजेडी नेता, तेलंगाना से मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव या टीआरएस नेता कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। इसके अलावा तमिलनाडु से डीएमके ने तूतीकोरीन में स्टरलाइट कॉपर यूनिट के खिलाफ प्रदर्शन में हिंसा के बाद शपथ ग्रहण में शामिल होने का कार्यक्रम रद्द कर दिया।

हालांकि कुल मिलाकर देखा जाए तो जो नज़ारा बिहार में जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस के महागठबंधन की सरकार में शपथ में देखने को मिला था कर्नाटक में कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन की सरकार के शपथ ग्रहण में वो ज्यादा भव्य था। हालांकि ये भव्यता 2019 चुनाव तक टिक पाएगी तभी विपक्ष को फायदा हो पाएगा।

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विपक्ष की एकजुटता का कारण ये भी है कि जिस तरह से 2014 के बाद बीजेपी का चुनावों में विजय रथ चला, उसने कांग्रेस को 4 राज्यों तक सीमित तो कर ही दिया और साथ ही क्षेत्रीय दलों के लिए भी चुनौती पेश की है। दिल्ली, बिहार, कर्नाटक में सरकार बनाने में विफल रही बीजेपी की सरकार अभी भी अकेले और गठबंधन के तौर पर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, असम, गोवा, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्कीम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश यानि कुल 20 राज्यों में है।

बीजेपी के पास 2014 से पहले गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, नागालैंड, गोवा, राजस्थान यानि कुल 6 राज्यों सरकार थी। बीजेपी ने 2014 के बाद जहां अकेले दम पर सरकार बनाई वो राज्य हैं…हरियाणा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश। इसके अलावा गठबंधन कर कई राज्यों में सरकार बनाकर इतिहास भी रचा…जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ, सिक्किम में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ, मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी के साथ।

अब बात करते हैं कांग्रेस की तो वह इस वक्त 3 राज्य (कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम) और 1 केंद्र शाषित राज्य (पुद्दुचेरी) में सरकार का हिस्सा है, वहीं कर्नाटक में जेडी(एस) से गठबंधन करके सरकार बनाई गई है।बीजेपी ने कांग्रेस के हाथ से 2014 के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश की सत्ता को छीना है।

वहीं क्षेत्रीय दलों की बात की जाए तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी, आन्ध्र प्रदेश में टीडीपी, तेलंगाना में टीआरएस, केरल में लेफ्ट फ्रंट, तमिलनाडु में एआईएडीएमके, उड़ीसा में नवीन पटनायक सरकार में हैं। केंद्रशाषित राज्य दिल्ली में आम आदमी पार्टी भी सरकार चला रही है। अब बात करते हैं बीजेपी ने कैसे क्षेत्रीय दलों को चुनौती पेश की है तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को हराया, बिहार में महागठबंधन से अलग होकर जेडीयू एनडीए गठबंधन में शामिल हो गई, झारखंड में शिबू सुरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा को हराया, त्रिपुरा में सीपीएम को हराया, जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाकर नेशनल कांफ्रेंस को सत्ता से महरुम कर दिया।

यानि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी का विजयरथ चलता रहा और कई राज्य में जीत का झंडा गाड भी दिया। लेकिन अब दिक्कते खड़ी होनी शुरु हो सकती है वो भी खासकर उत्तर प्रदेश में, बीजेपी आज केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में है इसके लिए यूपी की 2014 में जीती गई 71 सीटों के बहुत अहम मायने हैं। लेकिन हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र रहे गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के संसदीय क्षेत्र रहे गोरखपुर में बीएसपी और एसपी के गठबंधन के बाद बीजेपी की हार के बाद खतरे की घंटी पार्टी के लिए जरुर है। अब कैराना लोकसभा सीट पर भी यही होने जा रहा है यहां पर एसपी के उम्मीदवार को आरएलडी, बीएसपी, कांग्रेस समेत कई दलों ने समर्थन का ऐलान कर दिया है और बीजेपी के लिए अब यहां से सांसद हुकुम देव सिंह की मौत के बाद उनकी बेटी मृगांका सिंह को जीता पाना काफी मुश्किल होगा।

इसके अलावा बीजेपी को पश्चिम बंगाल में कुछ आसार दिख रहे हैं तो वहां भी टीएमसी और सीपीएम के बीच गठजोड़ की खबरें हैं। वहीं केरल में बीजेपी के खिलाफ लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस एक हो सकते हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना भी खेल बिगाड़ सकती है और कांग्रेस व एनसीपी एक होकर बीजेपी को चुनाती देंगे ही। हरियाणा में कांग्रेस और आईएनएलडी भी बीजेपी के खिलाफ एक होकर चुनौती पेश कर सकते हैं। उड़ीसा में भी बीजेडी और कांग्रेस एक हो सकते हैं ताकि बीजेपी एक भी सीट ना जीत पाए।

यानि कि कुल मिलाकर बीजेपी के लिए पूर्ण बहुमत के आसार तो खत्म होते दिख रहे हैं। बीजेपी कितना भी जोर लगा ले लेकिन पूर्ण बहुमत तक इस बार शायद ही पहुंच पाए। विपक्ष की एकजुटता से हालांकि संदेश ये भी जा रहा है जनता के बीच कि सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एकजुट हुए हैं।

वहीं, विपक्ष की एकजुटता के अलावा भी बीजेपी और एनडीए गठबंधन के लिए महंगाई, बेरोजगारी जैसे कई मुद्दे भी खातक साबित हो सकते हैं। पेट्रोल-डीज़ल रिकॉर्ड महंगाई के स्तर पर पहुंच चुके हैं, यानि बाकी चीजें भी महंगी ही मिल रही हैं।

अर्थव्यवस्था का भी यही हाल है, रुपया रोज डॉलर के आगे घुटने टिका ही देता है। जीएसटी और नोटबंदी का भी असर नकारात्मक रहा, हालांकि वैश्विक स्तर पर भारत के लिए काफी पॉजीटिव रिस्पांस आ रहा है।

लेकिन ओवरऑल बीजेपी के लिए अब कुआं और खाई दोनों खुद चुकी है। अब ये देखना होगा कि इस माहौल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार क्या कुछ ऐसा करती है कि जनता का मुड बदल जाए और विपक्ष की एकजुटता के बावजूद भारतीय जनता पार्टी अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा 2019 में छु ले।

हालांकि 2019 दूर की बात है बीजेपी के लिए पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव भी बड़ी चुनौती रहेंगे।

 

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