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पर्यावरण दिवस मनाकर भूल जाना हमारी आदत: ढोंग से ऊपर उठकर ज़मीन पर काम करने की ज़रूरत

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दुनिया हर साल 5 जून को पर्यावरण दिवस बनाती है। इस दिन दुनियाभर में कई कार्यक्रम होते हैं, वृक्षारोपण, सेमीनार, भाषण, ट्वीट, फेसबुक ज्ञान और ऐसे ही कुछ मिलते-जुलते ढोंग।

लेकिन होता क्या है, भारत में आज भी रिहाइशे इलाके नियमों के मुताबिक नहीं है, इन इलाकों के विकास के लिए पेड़ काट तो दिए जाते हैं लेकिन नए पेड़ नहीं लगाए जाते। बिल्डरों के बनाए अपार्टमेंट का तो और बुरा हाल है घर बेचने के लिए कोई हिस्सा नहीें छोड़ते जहां कंक्रीट का काम ना हुआ हो, ग्रीन एरिया बिल्कुल ना के बराबर।

वहीं, रिहाइशी इलाकों और औद्योगिक इलाकों में ज़्यादा दूरी भी नहीं है। कहां रिहाइशी इलाका है और कहां नहीं यह पता कर पाना बहुत मुश्किल है।

जंगलों का हाल तो और भी बुरा होता जा रहा है। शेर, तेंदुआ अब शहरों में मिल जाते हैं और जंगल ही खत्म हो रहे हैं तो वह भी कहां जाएंगे। कांग्रेस ने केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकारों पर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए कानून को कमज़ोर करने का आरोप भी लगाया है।

वहीं, गांव का क्षेत्र भी सिमटता जा रहा है। खेती कम हो रही है और किसानों की हालत तो जगजाहिर है। शहरों के बढ़ते दायरे में कई गांव के गांव समाते जा रहे हैं।

वहीं, वायु प्रदुषण भी चरम पर है। फैक्ट्रियों पर अंकुश तो है ही नहीं सरकार का, वाहनों के प्रदूषण पर भी कोई लगाम नहीं है। कई साल पुरानी गाड़ियां धडल्ले से प्रदूषण कर रही हैं लेकिन सरकार और प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है।

पानी का प्रदूषण तो किसी से छूपा नहीं है। देश की सबसे बड़ी नदी गंगा भी प्रदूषण से लड़ रही है, लाखों रूपये खर्च होने के बाद भी मूल समस्या वहीं हैं कि सीवेज का क्या किया जाए। सरकारें ना जाने किस एंगल से नदियों का साफ करना चाहती हैं। यमुना की स्थिति तो और बदतर है। देश की राजधानी दिल्ली की शान होने की बजाय नदी कलंक जैसी हो गई है। समस्या वही है कि सीवेज का क्या किया जाए?

प्लास्टिक अभी भी बहुत बड़ी समस्या है। कई राज्य सरकार प्लास्टिक बैन तो कर चुकी हैं लेकिन उसे सही से लागू नहीं कर पाई हैं और इस्तेमाल बदस्तूर जारी है।

क्लाइमेट चेंज दुनिया के लिए बहुत बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है और दुनिया भी जानती है कि भारत और चीन जैसे देशों से ही सबका भविष्य जुड़ा हुआ है क्योंकि दुनिया की सबसे ज़्यादा आबादी इन दो देशों में रहती है।

इलेक्ट्रीक वाहन इस कड़ी में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है जिसपर देश में काम भी हो रहा है।

हालांकि जिस स्तर पर प्रदूषण है उसपर काबू पाना बहुत मुश्किल है। सरकारें चाहे जितनी सख्त हो जाए लेकिन नियमों का पालन करना लोगों के हाथ में है।

पर्यावरण दिवस पर फोटो खींचवाने से आगे बढ़कर सबको सोचना होगा। वरना एक दिन ऐसा हाल होगा कि लोग का सांस लेना मुश्किल हो जाएगा।

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