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संविधान पर हावी राजनीति: कब तक जारी रहेगी नियमों को ताक पर रखकर राजनीति?

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भारत महान देश है और यहां के नेता उससे भी महापुरुष। हालांकि देश में लोकतंत्र है लेकिन भोली-भाली जनता राजनेताओं के इशारे पर चलते हैं, ऐसा इसलिए कि पार्टी का रिकॉर्ड और उम्मीदवार का काम देखकर वोट देने वाले लोगों की अहमियत ना के बराबर है।

देश में संविधान की धज्जियां उड़ाने का काम हर सरकार और राजनीतिक दल ने किया है। केंद्र में मौजूदा सरकार से लेकर इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार तक, हर कोई संविधान के नियमों को ताक पर रखकर राजनीति करने के लिए बदनाम रहे हैं।

कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है कि कैसे संविधान और लोकतंत्र के विरुद्ध सरकारों और राजनीतिक दलों ने काम किया है।

कर्नाटक में हाल में हुआ चुनाव और उसके बाद सरकार बनाने की जद्दोजहद:

ज़्यादा दूर नहीं जाते हुए हाल ही में हुए कर्नाटक चुनाव में राज्यपाल का बीजेपी के पास बहुमत नहीं होते हुए भी सरकार बनाने का न्यौता देना, दिखाता है कि कैसे केंद्र सरकार ने कर्नाटक में लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की। बीजेपी के पास 104 विधायक थे यानि बहुमत के लिए ज़रूरी 112 विधायक से 8 कम, दूसरी ओर कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन ने 117 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी राज्यपाल को सौंपी। राज्यपाल ने बीजेपी को अल्पमत में होने के बावजूद सरकार बनाने का मौका दिया जबकि कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन के 117 विधायकों को तोड़े बिना बीजेपी बहुमत साबित कर ही नहीं सकती। बीजेपी ने सरकार बनाई लेकिन फ्लोर टेस्ट से पहले ही तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया, वो भी भावनात्मक भाषण के साथ। हालांकि कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन के बीच भी मतभेद हैं लेकिन गठबंधन सरकार संविधान के अनुरूप है।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार बनाम केंद्र की मोदी सरकार के बीच जंग:

दिल्ली में जब से आम आदमी पार्टी की बंपर बहुमत (70 में से 67 सीट) की सरकार बनी है तभी से केंद्र और दिल्ली की सरकार के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती रहती है। केंद्र सरकार का दिल्ली पर लगभग राज्य सरकार के बराबर नियंत्रण होता है और उप-राज्यपाल सिर्फ नाम नहीं होता। दिल्ली के सरकार को अपने हर फैसले पर उप-राज्यपाल से मंज़ूरी लेनी ज़रूरी होती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि उनके कई जनता से जुड़े कामों को उप-राज्यपाल केंद्र सरकार के कहने पर लटका कर रखती है और कभी भी फाइलें लौटा दी जाती हैं। बीजेपी केंद्र में हैं और दिल्ली के स्थानीय प्रशासन (एमसीडी) में भी है, वहीं आम आदमी पार्टी बीच में है। दिल्ली के कई इलाकों में पानी, सड़क से जुड़ी समस्याओं की खबरें आती रहती हैं और उनमें से ज़्यादातर एमसीडी के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अब जो भी हो नुकसान दिल्ली की जनता का होता है यानि की लोकतंत्र को चलाने वाले संविधान का होता है।

आरक्षण बना कभी ना खत्म होने वाला संवैधानिक अधिकार, लेकिन बाकी लोगों का क्या?

संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलितों के उत्थान के लिए आरक्षण का प्रावधान सीमित समय के लिए किया था। सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, नौकरियों और कुछ मामलों में पदोन्नति में आरक्षण लागू किया गया था। पहले एससी और एसटी तक सीमित था लेकिन बाद में कई और पिछड़ी जातियों को शामिल कर ओबीसी कैटेगरी बना दी गई। संविधान में एससी/एसटी के लिए लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में आरक्षण का प्रावधान दस साल के लिए था लेकिन उसे हर दस साल में बढ़ाया गया और मौजूदा विस्तार 2020 तक मान्य है। हालांकि सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण 1954 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संविधान के आर्टिकल 15 के तहत लागू किया जिसकी कोई समयसीमा नहीं थी और 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिश पर प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार ने ओबीसी कैटेगरी के तहत अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का प्रावधान किया। कुल मिलाकर बात ये है कि वोटबैंक के लिए संविधान का गलत इस्तेमाल सरकारों ने किया और देश की जनता के बीच भेदभाव को मिटाने की जगह नफरत को बढ़ाने का भी काम किया। हालांकि आरक्षण से दलितों का जीवन सुधरा है लेकिन अमीर दलितों को आरक्षण के इस्तेमाल से रोका जाना चाहिए और आर्थिक आधार पर आरक्षण की शुरुआत होनी चाहिए।

1975 में लागू हुआ आपातकाल, इंदिरा गांधी द्वारा संविधान का दुरुपयोग:

1975 में इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रायबरेली से बतौर सांसद अयोग्य ठहराने के बाद देश ने आपातकाल देखा। विरोधियों राजनेताओं को चुप करने के लिए इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल किया और राजनीतिक हित के लिए देश में आपातकाल लागू कर दिया था। इंदिरा गांधी की इस करतूत का हालांकि देश की जनता ने 1977 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनवाकर जवाब भी दिया था।

कई मामले हैं जहां सरकारें मनमानी करती हैं, इन सरकारों को चलाते हैं राजनेता। राजनीति के लिए संविधान को ढाल बनाया जाता है और जिससे लोकतंत्र का महत्व कम होता जा रहा है।

 

 

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