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सर्वे भवंतु सुखिन:- सरकारें कब इस मंत्र पर काम करेंगी?

Poor man in looking at developed India

Poor man looking at developed India (Courtesy-Facebook)

साफ नीयत, सही विकास।

सरकार का नारा ही नहीं, इस नारे के हिसाब से काम भी होना चाहिए। देश में सभी का विकास हो, सभी खुश हो, सभी के पास संसाधन हो। देश में संविधान है जो लोकतंत्र को संचालित करता है, देश में लोग केंद्र और राज्यों के लिए सरकारें चुनते हैं लेकिन क्या सरकारें जनहित में काम करती हैं?

हालांकि कई लोगों को सरकारों की पहल का फायदा होता भी है जैसे अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) के लोग, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोग। हाल ही में केरल से मामले सामने आया कि कैसे एक कुली रेलेवे स्टेशन का वाई-फाई इस्तेमाल करके राज्य की सिविल सेवा परीक्षा में पास हो गया। कई राज्यों में सरकार कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाती हैं ताकी बच्चे उच्च शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों में एडमिशन ले सकें और सरकारी नौकरी में जा सकें।

किसानों के लिए योजनाएं, रोज़गार के लिए भी कई योजनाएं हैं, महिला सुरक्षा की भी कई योजनाएं, गरीबी दूर करने के लिए भी कई योजनाएं हैं।

इतनी सारी योजनाएं, केंद्र और राज्य सरकार, उनके लाखों अधिकारी-कर्मचारी, जिला प्रशासन, ग्राम पंचायत, इतने सारे अफसर और कर्मचारी कि अगर सही से इतनी बड़ी व्यवस्था का इस्तेमाल हो तो ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का मंत्र सच साबित हो सकता है।

देश में गरीबी कम नहीं हो रही लेकिन महंगाई बढ़ती ही जा रही है। किसान अभी भी पुराने तौर-तरीकों से काम कर रहे हैं जबकि स्मॉर्ट फॉर्मिंग करके फसलों से अमीर बन सकते हैं। शहरों में लोग मज़दूरी के कुचक्र में फंसे हैं। बड़ी कंपनियों में भी कमज़ोर श्रम कानून के चलते लोग परेशान हैं।

सवाल ये है कि देश संविधान के ज़रिए खड़ी हुई इतनी बड़ी व्यवस्था का लाभार्थी बनने की बजाय शिकार क्यों बन गया है? क्या संविधान में जनता के हितों को तवज्जोह नहीं दी गई? क्या संविधान देश के सभी लोगों ने लिए नहीं है?

व्यवस्था के सुचारु रूप से चलने के लिए ज़रूरी है कायदे-कानून का पालन करना। नेताओं की ज़िम्मेदारी जनता तय करती है लेकिन अधिकारियों की ज़िम्मेदारी का क्या?

2011 में अन्ना आंदोलन के वक्त ये बात सामने आई थी और उम्मीद बनी थी, नौकरशाही सही से काम करना शुरू करेगी।

लोकपाल आंदोलन से भ्रष्टाचार दूर होता, सिटीज़न चार्टर से समय पर काम होता। लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। लोकपाल कानून तो संसद से पास हो गया लेकिन लोकपाल की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है और राज्यों में भी लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हुई। कई राज्यों में पहले से लोकायुक्त है तो वह सिर्फ ना के हैं।

सिटीज़न चार्टर बिल संसद में कई सालों से लंबित है। तय समय पर काम ना होना भारत में सबसे बड़ी समस्या है और बिल ना पास होने से व्यवस्था पुराने ढर्रे पर ही चल रही है।

लेकिन बड़ा सवाल ये भी है कि संविधान में इसका प्रावधान क्यों नहीं किया गया था? हालांकि भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार में पहले से ही केंद्रीय सतर्कता आयोग है लेकिन आयोग की कार्यशैली ही लचर है या कहें अधिकारहीन है।

संविधान निर्माताओं और उसकी बाद आई सरकारों के मुखियाओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टोलेरेंस की नीति पर काम किया होता तो शायद देश की स्थिति कुछ और होती।

मौज़ूदा बीजेपी सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति उदासीनता भी सरकारों के कार्य करने के तरीके को उज़ागर करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बोलते-बोलते, बड़ी-बड़ी बाते करते-करते 4 साल निकाल दिए लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया।

अब देखना होगा कि यह कुचक्र चलता ही रहेगा या फिर सुप्रीम कोर्ट या सरकार से जनता को कोई राहत मिलेगी।

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