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कश्मीर में राष्ट्रवादी भी हुए चित: चले थे पीडीपी को सुधारने लेकिन मुंह की खानी पड़ी

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बीजेपी-पीडीपी गठबंधन सरकार की नाकामियां

  • आतंकवादियों को कश्मीर में आम-लोगों की सहानुभूति मिलती रही
  • पत्थरबाज़ों को मुख्य धारा में लाने की कोशिश काम नहीं आई
  • सेना के जवानों की शहादत कम नहीं हुई, उल्टा ज़्यादा सैनिक राज्य में शहीद हुए
  • कश्मीर में सेना के लिए स्थानीय लोगों में गुडविल नहीं पैदा कर पाए
  • कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने पर सिर्फ योजना बनी, काम नहीं हुआ
  • विकास में राज्य सरकार फेल रही, उद्योगों से कश्मीर अभी भी बहुत दूर।
  • धारा 370 राज्य के औद्योगिकर विकास में बहुत बड़ी अड़चन बनी रही।

बीजेपी ने पीडीपी के सामने कई मुद्दों पर घुटने टेक दिए

  • सुरक्षाबलों के आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ऑल आउट के बीच रमज़ान के दौरान सीज़फायर पर भरी हामी
  • 10 हज़ार पत्थरबाज़ों की रिहाई पर विरोध करने की बजाय पीडीपी का समर्थन किया
  • अलगाववादियों के खिलाफ कारगर कार्रवाई नहीं कर पाए
  • सुरक्षाबलों के जवानों पर एफआईआर का विरोध तक नहीं किया

3 साल में बीजेपी और पीडीपी का गठबंधन खत्म हो गया और इसी के साथ जम्मू-कश्मीर पर सत्ताधारी दल को मुंह की खानी पड़ी। एक वाक्य में कहें तो बड़े बड़े दावे करने वाली बीजेपी को अपनी विचारधाराओं के विपरित कई समझौते करने पड़े व आखिर में बीजेपी ने कश्मीर के खिलाफ बढ़ते गुस्से के बीच इस समस्या से अलगा होने का ही फैसला किया यानि अपना पल्ला झाड़ लिया। बीजेपी ने राज्य सरकार से अलग होकर कश्मीर को उसके हाल पर छोड़ दिया।

केंद्र में सत्ता संभाल रही बीजेपी जम्मू-कश्मीर में जूनियर पार्टनर बन कर रह गई थी और पीडीपी के सामने उसकी एक नहीं चल पा रही थी। रमज़ान के दौरान सीज़फायर को लेकर केंद्र को मना लिया गया और अंज़ाम क्या हुआ, यह सबके सामने है। सैनिकों की मौत का आंकड़ा राष्ट्रवादी बीजेपी के राज्य में सत्ता होते हुए भी बढ़ता चला गया।

2014 में जब जम्मू-कश्मीर में चुनाव हुए तो हंग असेंबली की स्थिति बन गई थी लेकिन सबसे बड़ी पार्टी थी पीडीपी (28 सीट), दूसरे नंबर पर बीजेपी (25) और तीसरे नंबर पर नेशनल कांफ्रेंस (15) रही थी। बीजेपी और पीडीपी के बीच करीब 2 महीने तक सरकार बनाने पर बात चली थी और मार्च 2015 में वह ऐतिहासिक पल आया था जब राष्ट्रवादी बीजेपी पहली बार जम्मू-कश्मीर सरकार का हिस्सा बनी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत के बाद फिर से राज्य में कई महीने तक सरकार नहीं बनी और फिर 2017 में महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बनी।

बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव में धारा 370 खत्म करने का चुनावी वादा किया था लेकिन पीडीपी के साथ गठबंधन में रहते हुए बीजेपी अपने ही मुद्दे से भटक गई थी। 2019 लोकसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम समय रह गया और बीजेपी के खिलाफ जम्मू-कश्मीर व पाकिस्तान को लेकर नीतिगत विफलता पर जनता का रोष बढ़ रहा था।

महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री रहते हुए बीजेपी से कई बातें मनवा भी ली। सबसे बड़ा फैसला था रमज़ान में सेना का आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन रोक देना। बीजेपी के लिए यह एक बड़ी गलती बनकर सामने आया और इस दौरान सेना के कई जवान शहीद हुए।

दूसरी ओर, पत्थरबाजों के खिलाफ अभियान तेज होने की जगह, महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार उन पर मेहरबानी दिखाने लगी। करीब 10 हज़ार पत्थरबाजों की रिहाई कर दी गई। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि बच्चों से गलती हो जाती है। बीच-बीच में कश्मीर में सीआरपीएफ व सेना के जवानों पर पत्थरबाज़ों का हमला करना और जवानों का कोई एक्शन ना ले पाना भी काफी रोष पैदा कर रहा था। वहीं, इस बीच बीजेपी की हिस्सेदारी वाली सरकार में सुरक्षाबलों के जवानों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई।

कश्मीर के इलाकों में आतंकवादियों के खिलाफ अभियान में भी पीडीपी नेतृत्व की अड़चनों की खबरें थीं और अंदरुनी इलाकों में पुलिस व सेना के बीच समन्वय भी इसके चलते कमज़ोर था।

पीओके को लेकर भी राज्य की बीजेपी-पीडीपी सरकार व केंद्र सरकार फेल रही। भारत के खिलाफ लगातार प्रोपेगेंडा तैयार किया जाता रहा और भारत पीओके में पाकिस्तान विरोधी आंदोलनों को भुना नहीं पाई। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में उलटा भारत पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगा।

अब बीजेपी अपना अलग रास्ता चुन चुकी है, पीडीपी से अलग होने से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाका (एनएसए) अजीत डोवल ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात भी की। यानि हो सकता है सरकार ने जम्मू-कश्मीर में आर्मी के ऑपरेशन पर कोई नई रणनीति भी तैयार की हो।

हालांकि कश्मीर का मुद्दा सीधे भारत और पाकिस्तान के संबंधों से जुड़ा हुआ है और केंद्र सरकार अपनी विदेश नीति की असफलता से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

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