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राम नाम जपना, मंदिर नहीं बनना: धार्मिक तुष्टिकरण की भेंट चढ़ा धार्मिक शहरों का विकास?

देश में एक साल बाद लोकसभा चुनाव है। मंडल-कमंडल से शुरु हुई राजनीति अब भी चल रही है और कामयाब भी है। भारतीय जनता पार्टी 1992 से लगातार मेनिफेस्टो में राम मंदिर बनवाने का वादा तो करती है लेकिन कोर्ट में अपना पक्ष तक नहीं रखती है। वहीं कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल राम मंदिर से दूरी बनाकर रखते हैं और शायद कोई कभी राम मंदिर गया भी नहीं होगा।

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साधू-संत अब बीजेपी के खिलाफ खुलकर बोलने लगे हैं। धमकी दे रहे हैं 2019 से पहले राम मंदिर पर फैसला नहीं हो पाया तो बीजेपी के खिलाफ प्रचार करेंगे, रातोंरात मंदिर बनवा देंगे, वगैरह वगैरह।

सुप्रीम कोर्ट भी मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए शायद सावधानी बरत रहा है या फिर हो सकता है 2019 से पहले फैसला हो भी जाए। जो भी होगा लेकिन बीजेपी के पैरों तले से राम नाम का वोट बैंक खीसकने वाला नहीं है। कई लोग अभी भी मानते हैं कि राम मंदिर पर बीजेपी ही कुछ कर सकती है। हालांकि बीजेपी नेताओं ने भी कह दिया है कि राम मंदिर बनेगा तो कानूनी अनुमति के बाद ही बनेगा।

अब बात करते हैं कि धार्मिक शहरों का क्या हाल है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में वाराणसी से चुनाव लड़ने पहुंचे, संदेश साफ था कि बीजेपी धर्म के नाम पर वोट बटोरना चाहती थी यह दिखाकर कि धार्मिक शहर से मोदी जी ने चुनाव लड़ा। लेकिन उसके बाद क्या हुआ वाराणसी में? काशी को क्योटो बनाने पर जापान के साथ डील की गई लेकिन क्या काशी में कोई बदलाव आया है?

कुछ लोगों का कहना है कि ज़मीन पर काम शुरु हो गया है और आने वाले समय में बनारस की तस्वीर बदलने वाली है। काशी में मेट्रो प्रोजेक्ट को भी मंज़ूरी दी गई है यानि सड़क पर विकास दिखने की पूरी उम्मीद की जा सकती है। सड़क पर तो सही है लेकिन क्या काशी के लोगों की ज़िंदगी में विकास होगा? बेरोज़गारी से युवाओं को निज़ात मिलेगी? काशी में गंगा अभी भी मैली है तो वह कब तक साफ होगी?

सवाल सिर्फ काशी का नहीं है लेकिन देश के कई धार्मिक शहर विकास से महरूम हैं। उत्तर प्रदेश के दो टॉप के धार्मिक शहरों मथुरा और अयोध्या में विकास की बदहाली को स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 से समझा जा सकता है।

धार्मिक शहरों में मथुरा की रैंकिंग में बड़ी गिरावट आई है। देश की 1 लाख से ज़्यादा आबादी वाले 500 शहरों की लिस्ट में पिछले साल 352वें नंबर से इस बार 428वें स्थान पर है। अयोध्या 2017 में 252वें नंबर पर था लेकिन इस साल लिस्ट में नाम तक नहीं है। संगम नगरी इलाहाबाद का भी बुरा हाल है मामूली सुधार के साथ 2017 में 247वें नंबर से इस साल 234वें नंबर पर पहुंच गया है। हरिद्वार की भी अच्छी स्थिति नहीं है हालांकि सुधार हुआ है और पिछले साल 244वें नंबर से 205वें पायदान पर पहुंच गया है।

मध्य प्रदेश में धार्मिक शहरों पर अच्छा काम किया गया है। फिर भी उज्जैन की रैंकिंग में गिरावट आई है, 2017 में 12वें पायदान से इस बार 17वें पायदान पर है।

ओड़ीसा में पुरी की स्थिति पिछले साल से खराब हुई है। 2017 में 194वें नंबर से इस साल करीब 200 पायदान गिरकर 391वें नंबर पर आ गया है।

राजस्थान में अजमेर में दरगाह शरीफ और पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर है। 2017 की 226वें नंबर पर रहा अजमेर 2018 में 106वें नंबर पर पहुंच गया है।

पंजाब के अमृतसर में भी स्वच्छता का ‘स्वर्ण’ युग आ गया है और 2017 में 258वें नंबर पर रहा अमृतसर इस बार 208वें नंबर पर है।

आंध्र प्रदेश का तिरूपति 6वें पायदान के साथ देश का सबसे स्वच्छ धार्मिक शहर शहर है। तिरूपति पिछले साल 9वें नंबर पर था और इस बार 3 पायदान का सुधार हुआ है।

देश में विकास की राजनीति हो तो सही होगा तभी काशी क्योटो बन पाएगी, मथुरा मक्का जैसा बन पाएगा और अयोध्या वेटिकन सिटी जैसे बन पाएगा।

 

 

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