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विचार विशेष: नोटबंदी पर RBI के आंकड़ों पर हंगामा: क्या हैं बारीकियां?

नोटबंदी में 99% करंसी वापस लौटी यानी नोटबंदी फेल। जिन्होंने नोटबंदी का समर्थन किया वे ‘अंधभक्त’ अब हैं कहां? सरकार के मूर्खतापूर्ण फैसलों का विरोध ‘देशद्रोह’ नहीं था, जनाब।

आरबीआई का आंकड़ा आने के बाद कुछ इन्हीं शब्दों में उलाहना दी जा रही है। उलाहना देने वालों में पूर्व संपादक स्तर के लोग हैं, जिनसे उम्मीद की जाती है कि कम से कम वो तो विषय के दोनों पक्षों को सामने रखेंगे।

खैर, अगर 99% करंसी का वापस लौटना ही नोटबंदी की नाकामी है, तो इसका एक मतलब ये हुआ कि देश में सभी ईमानदार हैं। किसी के पास बैन हुए 500 और 1000 रुपयों में काला धन था ही नहीं। लेकिन आप सभी सहज तौर पर जानते हैं कि ऐसा है नहीं। ये बात सच है कि काले धन का बड़ा हिस्सा संपत्ति के रूप में छुपाया गया लेकिन नकद भी काले धन के तौर पर सिस्टम में मौजूद रहा है।

अब सवाल है कि नोटबंदी में क्यों 99% रुपया लौटा? तो इसका एक ही उचित जवाब है, वो ये कि लोगों ने सोचा होगा कि भागते भूत की लंगोटी सही। मतलब ये कि नोटबंदी ने उन्हें मजबूर किया कि वो अपने unaccounted cash को सिस्टम के सामने उजागर करें और इस प्रक्रिया में भले पेनल्टी या अन्य किसी प्रकार के छोटे दंड के साथ वो अपने unaccounted cash को white money में बदल सकें। ऐसे में सरकार का ये तर्क सही जान पड़ता है कि भले 99% रुपया लौटा हो लेकिन अब उन रुपयों का एक address है जिसका संज्ञान लिया जा रहा है। टैक्स के दायरे का बढ़ना, 3 लाख से ज्यादा कंपनियों का डि-रजिस्टर होना, 37 हजार से ज्यादा शेल कंपनियों पर दंडात्मक कार्रवाई होना, इस बात का सबूत है कि नोटबंदी ने अपना असर दिखाया।

नोटबंदी की जो उचित आलोचना है, वो ये कि इससे अर्थव्यवस्था को झटका लगा। जून 2017 की तिमाही में बीते 3 साल की सबसे कम ग्रोथ हुई। छोटे उद्योगों को नुकसान पहुंचा। लेकिन अब जब अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी पर लौट चुकी है तो ऐसे में क्या सरकार के इस तर्क पर बहस नहीं की जानी चाहिए कि नोटबंदी ने सिर्फ एक कड़वी दवा का काम किया? रॉयटर्स पोल के मुताबिक अप्रैल से जून 2018 में जीडीपी 7.6% के दर से बढ़ी, यहां सनद रहे कि नोटबंदी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में एक और बड़ी बात हुई है, जीएसटी के रूप में। अगर इन दो disruptions के बाद अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, तो माना जाना चाहिए कि इसका मैनेजमेंट सही है। जीडीपी ग्रोथ की बात चली है तो एक और बात को नहीं भूला जाना चाहिए कि बीते 4 साल में महंगाई दर सामान्य स्तर पर बनी रही है। याद कीजिए मनमोहन सरकार के समय डबल डिजिट की महंगाई को लेकर दिया जाने वाला ये तर्क कि growth has some cost. इसके अलावा fiscal deficit को लेकर भी सरकार उचित निवारण की दिशा में कामयाब रही है।

खैर, वापस लौटते हैं नोटबंदी पर। नोटबंदी जब हुई तब हाई वैल्यू करंसी यानी बैन हुए 500 और 1000 रुपयों में 86% करंसी सर्कुलेशन में थी लेकिन मार्च 2018 में हाई वैल्यू करंसी में सर्कुलेशन 80.6% प्रतिशत थी। यानी नकदी में छोटे नोटों का चलन बढ़ा है, क्या इससे ये बात नहीं पता चलती कि लोग डिजिटल ट्रांजैक्शन की ओर बढ़े होंगे।

आरबीआई के 99% आंकड़े को तो सभी लुक्क लिया लेकिन कोई ये क्यों नहीं बताता कि आरबीआई ने ये भी कहा है कि अब सिस्टम में 3 से 4 लाख करोड़ वैल्यूएशन में कम करंसी है।

खैर, नोटबंदी आर्थिक विषय होने के बावजूद राजनीतिक विषय होकर रह गया, इसलिए इस पर कम से कम 2019 चुनाव तक बहस होती रहेगी। राजनीतिक दल इसे लेकर मुहावरे उछालें तो मुझे कुछ नहीं कहना लेकिन इस बात को पढ़-सुन कर दुख हुआ कि कथित बुद्धिजीवी आरबीआई के आंकड़े के बहाने नोटबंदी का समर्थन करने वालों को अंधभक्त जैसी उपमाएं दे रहे हैं जबकि यही बुद्धिजीवी खुद को free thinking का झंडाबरदार बताने से नहीं चूकते।
– अभय श्रीवास्तव।

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