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ग्रेट इंडिया शो पीस रेस: मोदी की स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से स्टैच्यू ऑफ मायावती तक

जी हां, देश में अब अलग ही रेस शुरू हो चुकी है। मुर्तियों की रेस, शो ऑफ की रेस। यहां हर दल की एक ही हालत है। किसी ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनवाई तो कोई दलितों के नाम पर समर्पित आलीशान पार्कों में खुद स्टैच्यू बनकर खड़ी हो गईं।

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सरदार पटेल देश के लौह पुरुष थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार ने उनको लोहे में उतारकर मूर्ति भी बना ही दिया। ₹3000 करोड़ की लागत से बनी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है। भारत सबसे मूर्तियों की सूची में सबसे ऊंची मूर्ति के साथ पहले पायदान पर है लेकिन कई मामलों में भारत सूचियों में पीछे से नंबर 1-10 पर है। गरीबी, बेरोज़गारी, आवास यानि मोटा-मोटा रोटी-कपड़ा-मकान के लिए जद्दोजहद देश के करोड़ों नागरिक कर रहे हैं।

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जिस देश में लोग आज भी भूख से मर रहे हों वहां महापुरुषों की हज़ारों करोड़ रुपए की मूर्तियां कहां तक जायज़ हैं। हालांकि, वोट बैंक भी कोई चीज़ होती है। बीजेपी का पटेल प्रेम ऐसे ही नहीं जगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से आते हैं तो पटेल के प्रति उनका प्रेम स्वाभाविक है लेकिन साथ में पटेलों के वोट से प्रेम को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

हार्दिक पटेल ने बीजेपी सरकार के खिलाफ पाटीदारों को आरक्षण दिलवाने के लिए आंदोलन किया। लाखों पटेल हार्दिक के साथ हो गए और बीजेपी सरकार के खिलाफ। खामियाजा बीजेपी को विधानसभा में भुगतना भी पड़ा। हालांकि, पाटीदार आंदोलन से पहले ही स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का ऐलान हो चुका था लेकिन यह मूर्ति पटेलों के गुस्से ज़रूर कम कर सकती है।

अब बात करते हैं, हमारी प्यारी भोलीभाली मायावती जी की। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के लोकार्पण के बाद बहनजी सामने आई और कहा कि बीजेपी नेताओं को उनके करोड़ों के पार्क व उसमें लगी हाथियों व मायावती जी की मूर्तियों की आलोचना करने के लिए माफी मांगनी चाहिए। बताइए, बीजेपी वालों ने मौका तो दे ही दिया बहनजी को बोलने का, अब जवाब तो बीजेपी वाले ही देंगे कि बहनजी के साथ ऐसी ज्यादती क्यों की गई।

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लेकिन मायावती के द्वारा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते लखनऊ और नोएडा में बनवाए गए पार्कों में व स्टैच्यू ऑफ यूनिटी में कुछ समानताएं और अंतर हैं।

समानता ये है कि दोनों में ही फिज़ूलखर्ची हुई है और दोनों ही महापुरुषों को समर्पित हैं। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सरदार पटेल  को और मायावती के आलीशान पार्क डा. बी.आर. अंबेडकर को।

अब अंतर भी जान लीजिए। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी में पटेल के इलावा किसी तथाकथित महापुरुष को जगह नहीं दी गई है। लेकिन मायावती के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की बीएसपी सरकार ने जो पार्क बनवाए वहां बीएसपी का चुनाव चिन्ह हाथी भी लगवाया गया वो एक नहीं कईं हैं और कई जगह हैं। वहीं, मायावती और बीएसपी के संस्थापक कांशीराम भी पार्कों में मूर्ति बनकर खड़े हैं।

अब बात करते हैं कि कांग्रेस को कहां तक फिज़ूलखर्ची के खिलाफ बोलने का हक है। दिल्ली में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का संग्राहालय है और उस पर विवाद हो रहा है कि वहां पर बाकी प्रधानमंत्रियों का संग्रहालय भी क्यों बनवाया जा रहा है। कांग्रेस के विरोध के बाद सफाई आई कि यह अलग प्रांगण होगा यानि खर्चा तो होगा वो भी तगड़ा वाला। अब बताइए कांग्रेस की फिज़ूलखर्ची के प्रति चिंता तो यही फूस्स हो गई। अब भई सरकार की संपत्ति है नेहरू मेमोरियल, वहां अगर बाकी प्रधानमंत्री आ जाएंगे तो क्या बुराई है। यही, फिज़ूलखर्ची विरोधी कांग्रेसियों ने सत्ता में रहते हुए पहले नेहरू के आवास और फिर इंदिरा गांधी के सरकारी आवास को उनके स्मारकों में तब्दील कर दिया। यानि बाद में जो प्रधानमंत्री आए उनके लिए पूरे एक घर को सुरक्षा के अनुसार फिर से तैयार किया गया यानि भाई खर्चा तो हुआ होगा।

कांग्रेस ने देशभर में ऐसे कई गैर-ज़रूरी स्मारक बनवा रखे हैं जो फिज़ूलखर्ची से बने हैं।

अब महाराष्ट्र में सरदार पटेल की स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से ऊंची शिवाजी की मूर्ति लगने वाली है, अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति लगने वाली है। लेकिन क्या मूर्तियों से देश में करीबी खत्म हो जाएगी, नहीं, गरीबी तो राजनीतिक दलों की खत्म होगी वोट बैंक जो भर जाएगा उनका।

मज़ा लीजिए, इस रेस का। लोकतंत्र का मज़ाक बना हुआ है आप भी मज़ा लीजिए बिल्कुल मुफ्त। क्योंकि आपके टैक्स के पैसों की तो मूर्ति बन रही हैं। भले ही आपके घर के बाहर सड़क ना हो, शहरों-गांवों में पीने का पानी ना हो, लोगों के पास स्वास्थ्य सुविधाएं ना हो, किसी के पास रोज़गार ना हो। यह लोकतंत्र है आनंद लीजिए। जात-पात, हिंदू-मुसलमान के नाम पर वोट देते रहिए।

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